अथर्ववेदAtharvavedaAV 10.8

ज्येष्ठ ब्रह्म का रहस्यRiddles of the supreme Brahman

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश् चाधितिष्ठति ।स्व् अ᳙र्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः

    जो भूत और भविष्य — इस सबका अधिष्ठाता है, और जिसका अकेले का ही स्वर् (ज्योतिर्लोक) है, उस ज्येष्ठ ब्रह्म को नमस्कार।

    Homage to that supreme Brahman who rules over what has been and what is to be, and over all, and to whom alone the light of heaven belongs.

  2. २

    स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश् च भूमिश् च तिष्ठतः ।स्कम्भ इदं सर्वम् आत्मन्वद् यत् प्राणन् निमिषच् च यत्

    स्कम्भ से थामे जाकर ही ये दोनों — द्यौ और पृथिवी — टिके हुए हैं। स्कम्भ ही यह सारा आत्मावान् जगत् है — जो साँस लेता है और जो पलक झपकाता है।

    Propped apart by the Skambha, these two, heaven and earth, stand firm. The Skambha is all this that has a self, all that breathes and blinks.

  3. ३

    तिस्रो ह प्रजा अत्यायम् आयन् न्य् अ᳙न्या अर्कम् अभितो ऽविशन्त ।बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीर् आ विवेश

    तीन प्रजाएँ आगे निकल गईं; दूसरी अर्क के चारों ओर बैठ गईं। अन्तरिक्ष को मापने वाला वह महान् ऊपर खड़ा रहा, और हरित ने हरी (किरणों/दिशाओं) में प्रवेश किया।

    Three generations passed beyond; the others settled around the arka. The great one stood measuring out the mid-space; the yellow one entered the yellow ones.

  4. ४

    द्वादश प्रधयश् चक्रम् एकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच् चिकेत ।तत्राहतास् त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश् च खीला अविचाचला ये

    बारह प्रधियाँ (परिधि-खंड), एक चक्र, तीन नाभियाँ — इसे कौन जानता है? उसमें तीन सौ कीलें और साठ खूँटियाँ ठोकी गई हैं, जो हिलती नहीं।

    Twelve felly-pieces, one wheel, three naves: who has understood that? In it are driven three hundred pegs and sixty pins that never wobble.

  5. ५

    इदं सवितर् वि जानीहि षड् यमा एक एकजः ।तस्मिन् हापित्वम् इछन्ते य एषाम् एक एकजः

    हे सवितर्, इसे भली-भाँति समझो — छह जुड़वाँ हैं और एक अकेला जन्मा हुआ। इनमें जो एक अकेला जन्मा है, उसी में वे अपना साझा (सम्बन्ध) चाहते हैं।

    Savitar, discern this: six are twins, one is born alone. They seek a share in that one of them who is born alone.

  6. ६

    आविः सन् निहितं गुहा जरन् नाम महत् पदम् ।तत्रेदं सर्वम् आर्पितम् एजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम्

    प्रकट होते हुए भी गुहा में रखा हुआ वह महान् पद है, जिसका नाम 'जरत्' (पुरातन) है। उसी में यह सब — जो चलता है, साँस लेता है — टिका हुआ रखा है।

    Though manifest, it is hidden in secret: the great station whose name is 'Ancient'. In it all this is fixed; whatever moves and breathes is founded there.

  7. ७

    एकचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा ।अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यद् अस्यार्धं क्व᳙ तद् बभूव

    एक चक्र वाला, एक नेमि वाला, हजार अक्षरों वाला (चक्र) आगे पूर्व की ओर और नीचे पश्चिम की ओर घूमता है। आधे से उसने सारा भुवन उत्पन्न किया; उसका जो आधा है, वह कहाँ हो गया?

    It rolls on with one wheel and one rim, with a thousand syllables, forward in front and down behind. With half it gave birth to the whole world; where has its other half gone?

  8. ८

    पञ्चवाही वहत्यग्रम् एषां प्रष्टयो युक्ता अनुसंवहन्ति ।अयातम् अस्य ददृशे न यातं परं नेदीयो ऽवरं दवीयः

    पाँच घोड़ों वाली गाड़ी इनके आगे-आगे खींचती है, और जुते हुए बगल के घोड़े साथ-साथ खींचते हैं। इसका न चला हुआ भाग दिखाई देता है, चला हुआ नहीं; जो परे है वह अधिक निकट है, और जो निकट है वह अधिक दूर।

    A five-horse team draws the front of these, and the yoked side-horses pull along behind. Its untravelled road is seen, not the travelled one; the farther is nearer, the nearer is farther.

  9. ९

    तिर्यग्बिलश् चमस ऊर्ध्वबुध्नस् तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।तद् आसत ŕ̥षयः सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवुः

    एक चमस (कटोरा) है जिसका मुँह तिरछा और पेंदा ऊपर की ओर है; उसमें विश्वरूप यश रखा हुआ है। उसके पास सातों ऋषि एक साथ बैठे, जो इस महान् के रक्षक हुए।

    There is a cup with its mouth to the side and its bottom turned up; in it is placed glory of every form. There sit the seven seers together, who became the guardians of this great one.

  10. १०

    या पुरस्ताद् युज्यते या च पश्चाद् या विश्वतो युज्यते या च सर्वतः ।यया यज्ञः प्राङ् तायते तां त्वा पृछामि कतमा सा ऋचाम् ॥१०॥ {२६}

    जो पूर्व की ओर से जोड़ी जाती है और जो पश्चिम की ओर से, जो सब ओर से जोड़ी जाती है और जो सर्वत्र, जिससे यज्ञ पूर्व की ओर फैलाया जाता है — उसी के विषय में मैं तुझसे पूछता हूँ: ऋचाओं में वह कौन-सी है?

    The one that is yoked in front and behind, yoked on every side and everywhere, by which the yajna is stretched out eastward: I ask you about her — which of the verses is she?

  11. ११

    यद् एजति पतति यच् च तिष्ठति प्राणद् अप्राणन् निमिषच् च यद् भुवत् ।तद् दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत् संभूय भवत्य् एकम् एव

    जो चलता है, जो उड़ता है, जो स्थिर है; जो साँस लेता है, जो साँस नहीं लेता, और जो पलक झपकाता है — उसी ने विश्वरूप पृथ्वी को धारण किया; वह सब मिलकर एक ही हो जाता है।

    What moves, flies and stands still, what breathes and does not breathe, what blinks, whatever has come to be — that, in all its forms, holds up the earth; coming together, it becomes just one.

  12. १२

    अनन्तं विततं पुरुत्रानन्तम् अन्तवच् चा समन्ते ।ते नाकपालश् चरति विचिन्वन् विद्वान् भूतम् उत भव्यम् अस्य

    अनन्त और बहुत ओर फैला हुआ; एक अनन्त है और एक अन्तवाला — ये दोनों सीमा पर आपस में मिलते हैं। इन दोनों के बीच स्वर्ग का रक्षक छाँटता हुआ विचरता है, जो इसके भूत और भविष्य को जानता है।

    The infinite is spread out in many places; the infinite and the finite share a common border. The guardian of the vault of heaven moves between them, telling them apart, knowing its past and its future.

  13. १३

    प्रजापतिश् चरति गर्भे अन्तर् अदृश्यमानो बहुधा वि जायते ।अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यद् अस्यार्धं कतमः स केतुः

    प्रजापति गर्भ के भीतर विचरता है; दिखाई न देता हुआ वह अनेक रूपों में जन्म लेता है। आधे से उसने सारा भुवन उत्पन्न किया; उसका जो आधा है, उसका चिह्न कौन-सा है?

    Prajapati moves within the womb; unseen, he is born in many forms. With half he gave birth to the whole world; what is the sign of his other half?

  14. १४

    ऊर्ध्वं भरन्तम् उदकं कुम्भेनेवोदहार्य᳙म् ।पश्यन्ति सर्वे चक्षुषा न सर्वे मनसा विदुः

    जैसे घड़े से पानी भरनेवाला, वैसे ही जल को ऊपर उठाते हुए उसे सब लोग आँखों से देखते हैं, पर सब मन से नहीं जानते।

    The one who carries water upward, as water is drawn up with a jar — all see him with the eye, but not all know him with the mind.

  15. १५

    दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते ।महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बलिं राष्ट्रभ्ŕ̥तो भरन्ति

    वह दूर ही पूर्ण के साथ बसता है, और दूर ही अपूर्ण उसे नहीं पाता। भुवन के बीच में वह महान् यक्ष (गूढ़ सत्ता) है, जिसे राष्ट्र धारण करने वाले बलि अर्पित करते हैं।

    With the full it dwells far off; with the lacking it falls away far off. A great mystery (yakṣa) stands at the centre of the world; to it the upholders of kingdoms bring tribute.

  16. १६

    यतः सूर्यः उदेत्य् अस्तं यत्र च गछति ।तद् एव मन्ये ऽहं ज्येष्ठं तद् उ नात्य् एति किं चन

    जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ वह अस्त होता है — उसी को मैं ज्येष्ठ मानता हूँ; उससे आगे कुछ भी नहीं जाता।

    That from which the sun rises and into which it goes to set — that alone I consider supreme; nothing whatever goes beyond it.

  17. १७

    ये अर्वाङ् मध्य उत वा पुराणं वेदं विद्वांसम् अभितो वदन्ति ।आदित्यम् एव ते परि वदन्ति सर्वे अग्निं द्वितीयं त्रिव्ŕ̥तं च हंसम्

    जो लोग — नए, मध्यवर्ती या पुराने — वेद के जानकार के विषय में चारों ओर से बोलते हैं, वे सब आदित्य की ही बात कहते हैं, दूसरे अग्नि की, और त्रिवृत् हंस की।

    Those, whether recent, of the middle time, or of old, who talk all around about the knower of the Veda — all of them are really talking about the Aditya, about Agni as the second, and about the threefold swan.

  18. १८

    सहस्राह्ण्यं वियताव् अस्य पक्षौ हरेर् हंसस्य पततः स्वर्गम् ।स देवान्त् सर्वान् उरस्य् उपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा

    स्वर्ग की ओर उड़ते उस हरे हंस के दोनों पंख हजार दिनों तक फैले हुए हैं। वह सब देवों को अपने वक्ष पर धारण करके, देखता हुआ सब भुवनों में जाता है।

    The two wings of this golden swan flying to heaven are spread a thousand days' journey wide. Holding all the gods to his breast, he travels on, watching over all the worlds.

  19. १९

    सत्येनोर्ध्वस् तपति ब्रह्मणार्वाङ् वि पश्यति ।प्राणेन तिर्यङ् प्राणति यस्मिन् ज्येष्ठम् अधि श्रितम्

    वह सत्य से ऊपर तपता है, ब्रह्म से इस ओर देखता है, प्राण से तिरछा साँस लेता है — जिसमें वह ज्येष्ठ आश्रित है।

    By truth he blazes above, by brahman he looks down this way, by breath he breathes across — he in whom the supreme rests.

  20. २०

    यो वै ते विद्याद् अरणी याभ्यां निर्मथ्यते वसु ।स विद्वान् ज्येष्ठं मन्येत स विद्याद् ब्राह्मणं महत् ॥२०॥ {२७}

    जो तेरी उन दोनों अरणियों को जान ले जिनसे वसु मथकर निकाला जाता है, वही जानकार ज्येष्ठ को समझे, वही उस महान् ब्रह्म को जाने।

    Whoever knows the two fire-sticks from which wealth is churned out — that knower can grasp the supreme; he can know the great brāhmaṇa.

  21. २१

    अपाद् अग्रे सम् अभवत् सो अग्रे स्व᳙र् आभरत् ।चतुष्पाद् भूत्वा भोग्यः सर्वम् आदत्त भोजनम्

    आरम्भ में वह बिना पैरों का हुआ; उसी ने आरम्भ में स्वर् (ज्योति) को ले आया। फिर चार पैरों वाला और भोग्य होकर उसने सारा भोजन ग्रहण किया।

    In the beginning he came into being footless; he first brought the light. Becoming four-footed and fit to be enjoyed, he took in all food.

  22. २२

    भोग्यो भवद् अथो अन्नम् अदद् बहु ।यो देवम् उत्तरावन्तम् उपासातै सनातनम्

    वह भोग्य होगा और बहुत अन्न खाएगा, जो उस ऊपर रहने वाले सनातन देव की उपासना करेगा।

    Whoever worships the eternal god who stands above all will prosper and eat abundant food.

  23. २३

    सनातनम् एनम् आहुर् उताद्य स्यात् पुनर्णवः ।अहोरात्रे प्र जायेते अन्यो अन्यस्य रूपयोः

    उसे सनातन कहते हैं, फिर भी वह आज नया हो जाए, ऐसा भी है। दिन और रात एक-दूसरे के रूप से उत्पन्न होते रहते हैं।

    They call him eternal, yet today he may be new again. Day and night are born, each from the other's form.

  24. २४

    शतं सहस्रम् अयुतं न्य᳙र्बुदम् असंख्येयं स्वम् अस्मिन् निविष्टम् ।तद् अस्य घ्नन्त्य् अभिपश्यत एव तस्माद् देवो रोचत् एष एतत्

    सौ, हजार, अयुत, न्यर्बुद, अनगिनत — उसका अपना (धन) उसी में रखा है। उसके देखते-देखते ही उसे नष्ट करते रहते हैं; इसीलिए यह देव इस प्रकार चमकता है।

    A hundred, a thousand, ten thousand, a hundred million — his own wealth, beyond counting, is set within him. They strike it (that wealth) down while he looks on; that is why this god shines as he does.

  25. २५

    बालाद् एकम् अणीयस्कम् उतैकं नेव दृश्यते ।ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया

    एक (रूप) बाल से भी सूक्ष्म है, और एक ऐसा है जो दिखाई ही नहीं देता। उससे भी अधिक व्यापक जो देवता है, वही मुझे प्रिय है।

    One thing is finer than a hair, and one is as if not seen at all. More all-embracing still is the deity that is dear to me.

  26. २६

    इयं कल्याण्य् अ᳙जरा मर्त्यस्याम्ŕ̥ता गृहे ।यस्मै कृता शये स यश् चकार जजार सः

    यह कल्याणी, न बूढ़ी होने वाली, अमर स्त्री मर्त्य के घर में है। जिसके लिए वह बनाई गई वह पड़ा रह गया, और जिसने उसे बनाया वह बूढ़ा हो गया।

    This lovely one, unageing and immortal, lives in the house of a mortal. The one she was made for lies asleep; the one who made her has grown old.

  27. २७

    त्वं स्त्री त्वं पुमान् असि त्वं कुमार उत वा कुमारी॥ त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः

    तू ही स्त्री है, तू ही पुरुष; तू ही कुमार है और कुमारी भी। तू ही बूढ़ा होकर लाठी के सहारे लड़खड़ाता चलता है, और तू ही जन्म लेकर सब ओर मुख वाला हो जाता है।

    You are woman, you are man, you are boy and girl too. Grown old, you totter along with a staff; once born, you face in every direction.

  28. २८

    उतैषां पितोत वा पुत्र एषाम् उतैषां ज्येष्ठ उत वा कनिष्ठः ।एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः स उ गर्भे अन्तः

    वही इनका पिता है और इनका पुत्र भी, वही इनका ज्येष्ठ है और कनिष्ठ भी। एक ही देव मन में प्रविष्ट है — वही सबसे पहले जन्मा और वही गर्भ के भीतर है।

    He is their father and also their son, their eldest and also their youngest. The one god has entered the mind; he was born first, and he is also within the womb.

  29. २९

    पूर्णात् पूर्णम् उद् अचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते ।उतो तद् अद्य विद्याम यतस् तत् परिषिच्यते

    पूर्ण से पूर्ण उठता है, पूर्ण को पूर्ण से ही सींचा जाता है। आज हम यह जान लें कि वह किससे सींचा जाता है।

    From the full he draws up the full; the full is poured with the full. May we know today where it is poured from.

  30. ३०

    एषा सनत्नी सनम् एव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव ।मही देव्य् उ᳙षसो विभाती सैकेनैकेन मिषता वि चष्टे ॥३०॥ {२८}

    यह सनातनी है, आदि से ही उत्पन्न; यह पुरातन सब पर छा गई है। उषा की महान् देवी चमकती हुई एक-एक पलक झपकाने वाले के द्वारा देखती है।

    She is ancient, born long ago; this old one has spread over everything. The great goddess, shining out from the dawns, looks out through each creature that blinks.

  31. ३१

    अविर् वै नाम देवतर्तेनास्ते परीवृता ।तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः

    'अवि' नाम की एक देवता है, जो ऋत से घिरी हुई बैठी है। उसी के रूप से ये वृक्ष हरे हैं और हरी मालाओं वाले हैं।

    There is a deity named Avi, who sits wrapped in ṛta. By her form these trees are green and wear green garlands.

  32. ३२

    अन्ति सन्तं न जहात्य् अन्ति सन्तं न पश्यति ।देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति

    जो पास है उसे वह छोड़ता नहीं, और जो पास है उसे वह देखता भी नहीं। देव की इस कवि-शक्ति को देख — वह न मरा, न जीर्ण होता है।

    One does not leave the one who is near, yet does not see the one who is near. See the god's poetic art: it has not died and does not grow old.

  33. ३३

    अपूर्वेणेषिता वाचस् ता वदन्ति यथायथम् ।वदन्तीर् यत्र गछन्ति तद् आहुर् ब्राह्मणं महत्

    उस अपूर्व (जिससे पहले कोई नहीं) से प्रेरित होकर वे वाणियाँ यथायोग्य बोलती हैं। बोलती हुई वे जहाँ पहुँचती हैं, उसी को महान् ब्रह्म कहते हैं।

    Set in motion by the one who has no predecessor, the voices speak each in its proper way. The place they go to as they speak is called the great brāhmaṇa.

  34. ३४

    यत्र देवाश् च मनुष्या᳙श् चारा नाभाव् इव श्रिताः ।अपां त्वा पुष्पं पृछामि यत्र तन् मायया हितम्

    जहाँ देव और मनुष्य नाभि में लगे अरों की तरह टिके हुए हैं — मैं तुझसे जलों का वह पुष्प पूछता हूँ, वह कहाँ माया से रखा गया है?

    Where gods and humans rest like spokes in a hub — I ask you about the flower of the waters, where it has been placed by māyā.

  35. ३५

    येभिर् वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशः सध्रीचीः ।य आहुतिम् अत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे त आसन्

    जिनसे प्रेरित होकर वायु बहता है, जो पाँचों दिशाओं को एक साथ थामे रहते हैं, जिन देवों ने आहुति को तुच्छ समझा — जलों के वे नेता कौन थे?

    Those who drive the wind to blow, who hold the five directions together, the gods who thought themselves beyond the oblation — who were they, the leaders of the waters?

  36. ३६

    इमाम् एषां पृथिवीं वस्त एको ऽन्तरिक्षं पर्य् एको बभूव ।दिवम् एषां ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रति रक्षन्त्य् एके

    इनमें से एक इस पृथ्वी को वस्त्र की तरह ओढ़े है, एक अन्तरिक्ष को घेरे हुए है। जो विधाता है वह इन्हें द्युलोक देता है, और कुछ सब दिशाओं की रक्षा करते हैं।

    One of them wraps this earth, one has encircled the mid-air; the one among them who is the upholder holds the sky; some guard all the quarters.

  37. ३७

    यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्न् ओताः प्रजा इमाः ।सूत्रं सूत्रस्य यो विद्याद् स विद्याद् ब्राह्मणं महत्

    जो उस फैले हुए सूत्र को जान ले जिसमें ये सब प्रजाएँ बुनी हुई हैं, और जो सूत्र के सूत्र को जान ले — वही महान् ब्रह्म को जानता है।

    Whoever knows the thread stretched out, on which all these creatures are woven, and whoever knows the thread of that thread — he could know the great brāhmaṇa.

  38. ३८

    वेदाहं सूत्रं विततं यस्मिन्न् ओताः प्रजा इमाः ।सूत्रं सूत्रस्याहं वेदाथो यद् ब्राह्मणं महद्

    मैं उस फैले हुए सूत्र को जानता हूँ जिसमें ये सब प्रजाएँ बुनी हुई हैं; मैं सूत्र के सूत्र को भी जानता हूँ, और उस महान् ब्रह्म को भी।

    I know the thread stretched out, on which these creatures are woven. I know the thread of the thread, and also what the great brāhmaṇa is.

  39. ३९

    यद् अन्तरा द्यावापृथिवी अग्निर् ऐत् प्रदहन् विश्वदाव्यः᳙ ।यत्रातिष्ठन्न् एकपत्नीः परस्तात् क्वे᳙वासीन् मातरिश्वा तदानीम्

    जब द्यौ और पृथिवी के बीच सबको जला देने वाला अग्नि चला, जहाँ परे एकपत्नी स्त्रियाँ खड़ी थीं — तब मातरिश्वा कहाँ था?

    When all-consuming Agni went between heaven and earth, burning as he went, and the wives of one husband stood far beyond — where was Mātariśvan then?

  40. ४०

    अप्स्व् आ᳙सीन् मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्य् आसन्॥ बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश

    मातरिश्वा जलों में प्रविष्ट था; देव भी प्रविष्ट होकर जलों में थे। अन्तरिक्ष को मापने वाला वह महान् ऊपर खड़ा रहा, और पवमान हरी (दिशाओं) में प्रविष्ट हुआ।

    Mātariśvan had entered the waters; the gods had entered the floods. The great one stood measuring out the mid-space; the purifying one entered the yellow ones.

  41. ४१

    उत्तरेणेव गयत्रीम् अम्ŕ̥ते ऽधि वि चक्रमे ।साम्ना ये साम संविदुर् अजस् तद् ददृशे क्व᳙

    मानो ऊपर वाली से गायत्री को लाँघकर उसने अमृत में पग रखा। जिन्होंने साम से साम को पहचाना — वह अज कहाँ दिखाई दिया?

    As if higher than the gāyatrī, he strode out in the immortal. Those who know the sāman through the sāman (let them say): where was the unborn one seen?

  42. ४२

    निवेशनः संगमनो वसूनां देव इव सविता सत्यधर्मा ।इन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्

    वह वसुओं को बसाने वाला और एकत्र करने वाला है, सविता देव की तरह सत्य ही जिसका धर्म है। धनों के संग्राम में वह इन्द्र की तरह खड़ा रहा।

    Settler and gatherer of riches, like the god Savitar whose laws hold true, he stood firm like Indra in the contest for wealth.

  43. ४३

    पुण्डरीकं नवद्वारं त्रिभिर् गुणेभिर् आवृतम् ।तस्मिन् यद् यक्षम् आत्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः

    नौ द्वारों वाला, तीन गुणों से घिरा हुआ जो पुण्डरीक (कमल) है, उसमें जो आत्मा वाला यक्ष है — उसी को ब्रह्म के जाननेवाले जानते हैं।

    There is a lotus with nine doors, wrapped in three strands. The knowers of brahman know the self-possessed mystery (yakṣa) within it.

  44. ४४

    अकामो धीरो अम्ŕ̥तः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश् चनोनः ।तम् एव विद्वान् न बिभाय मृत्योर् आत्मानं धीरम् अजरं युवानम् ॥४४॥ {२९}

    वह कामनारहित, धीर, अमर, स्वयंभू, रस से तृप्त और किसी भी बात में अधूरा नहीं। उसी को — उस धीर, अजर, सदा युवा आत्मा को — जो जान लेता है, वह मृत्यु से नहीं डरता।

    Free of desire, wise, immortal, self-existent, satisfied with the essence, lacking nothing anywhere: whoever knows that wise, unageing, youthful self has no fear of death.