अथर्ववेदAtharvavedaAV 10.7

विश्व-आधार स्कम्भSkambha, the cosmic support

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    कस्मिन्न् अङ्गे तपो अस्याधि तिष्ठति कस्मिन्न् अङ्ग ऋतम् अस्याध्य् आहितम् ।क्व᳙ व्रतं क्व᳙ श्रद्धास्य तिष्ठति कस्मिन्न् अङ्गे सत्यम् अस्य प्रतिष्ठितम्

    इसके किस अंग में तप ठहरा हुआ है? किस अंग में इसका ऋत रखा गया है? इसका व्रत कहाँ और श्रद्धा कहाँ स्थित है? किस अंग में इसका सत्य प्रतिष्ठित है?

    In which of his limbs does tapas rest? In which limb is ṛta placed? Where do his vows and his faith stand, and in which limb is his truth established?

  2. २

    कस्माद् अङ्गाद् दीप्यते अग्निर् अस्य कस्माद् अङ्गात् पवते मातरिश्व ।कस्माद् अङ्गाद् वि मिमीते ऽधि चन्द्रमा मह स्कम्भस्य मिमानो अङ्गम्

    इसके किस अंग से अग्नि जलती है, किस अंग से मातरिश्वा बहता है? किस अंग से चन्द्रमा महान् स्कम्भ के अंग को नापता हुआ माप करता है?

    From which of his limbs does Agni blaze, from which does Mātariśvan blow? From which limb does the moon measure out its course, measuring the limb of the great Skambha?

  3. ३

    कस्मिन्न् अङ्गे तिष्ठति भूमिर् अस्य कस्मिन्न् अङ्गे तिष्ठत्य् अन्तरिक्षम् ।कस्मिन्न् अङ्गे तिष्ठत्य् आहिता द्यौः कस्मिन्न् अङ्गे तिष्ठत्य् उत्तरं दिवः

    इसके किस अंग में भूमि ठहरी है, किस अंग में अन्तरिक्ष ठहरा है? किस अंग में टिका हुआ द्युलोक ठहरा है, और किस अंग में वह ठहरा है जो द्युलोक से भी ऊपर है?

    In which of his limbs does the earth stand, in which the mid-air? In which limb does the sky, set in place, stand, and in which what lies beyond the sky?

  4. ४

    क्व᳙ प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः क्व᳙ प्रेप्सन् पवते मातरिश्वा ।यत्र प्रेप्सन्तीर् अभियन्त्य् आव्ŕ̥तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    किसे पाने की इच्छा से अग्नि ऊपर की ओर जलती है, किसे पाने की इच्छा से मातरिश्वा बहता है? जहाँ पहुँचने की इच्छा से आवृत् (घूमने वाली गतियाँ) जाती हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Seeking what does Agni blaze upward, seeking what does Mātariśvan blow? Tell me of that Skambha toward which the circling courses go in longing — which one, then, is he?

  5. ५

    क्वा᳙र्धमासाः क्व᳙ यन्ति मासाः संवत्सरेण सह संविदानाः ।यत्र यन्त्य् ऋतवो यत्रार्तवाः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    अर्धमास कहाँ जाते हैं, संवत्सर के साथ मिलकर चलने वाले मास कहाँ जाते हैं? जहाँ ऋतुएँ जाती हैं और जहाँ आर्तव (ऋतुओं के भाग) जाते हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Where do the half-months go, and where the months, moving in accord with the year? Tell me of that Skambha to which the seasons and their divisions go — which one, then, is he?

  6. ६

    क्व᳙ प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवतः संविदाने ।यत्र प्रेप्सन्तीर् अभियन्त्य् आपः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    किसे पाने की इच्छा से भिन्न रूप वाली वे दो युवतियाँ — दिन और रात — एक-दूसरे से मिलकर दौड़ती हैं? जहाँ पहुँचने की इच्छा से जल जाते हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Seeking what do the two young women of different forms, day and night, run in harmony? Tell me of that Skambha toward which the waters go in longing — which one, then, is he?

  7. ७

    यस्मिन्त् स्तब्ध्वा प्रजापतिर् लोकान्त् सर्वाꣳ अधारयत् ।स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसमें टेक लगाकर प्रजापति ने सब लोकों को धारण किया — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha on which Prajāpati propped up and held all the worlds — which one, then, is he?

  8. ८

    यत् परमम् अवमम् यच् च मध्यमं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम् ।कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र यन् न प्राविशत् कियत् तद् बभूव

    जो सबसे ऊपर का, जो सबसे नीचे का और जो बीच का है — प्रजापति ने जिस सब रूप वाले जगत् को रचा, उसमें स्कम्भ कितने अंश से प्रविष्ट हुआ? और जो भीतर नहीं गया, वह कितना रहा?

    The highest, the lowest and the middle, the world of every form that Prajāpati created — how much of it did Skambha enter? And how large was what he did not enter?

  9. ९

    कियता स्कम्भः प्र विवेश भूतम् कियद् भविष्यद् अन्वाशये ऽस्य ।एकं यद् अङ्गम् अकृणोत् सहस्रधा कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र

    स्कम्भ कितने अंश से भूत (जो हो चुका) में प्रविष्ट हुआ? उसके भीतर भविष्य कितना पड़ा है? जिस एक अंग को उसने हजार भागों में किया, उसमें स्कम्भ कितने अंश से प्रविष्ट हुआ?

    How much of the past did Skambha enter? How much of the future lies in his keeping? The one limb that he made thousandfold — how much of it did Skambha enter?

  10. १०

    यत्र लोकाम्श् च कोशांश् चापो ब्रह्म जना विदुः ।असच् च यत्र सच् चान्त स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः ॥१०॥ {२२}

    जहाँ लोगों को लोक, कोश, जल और ब्रह्म ज्ञात हैं, और जहाँ असत् तथा सत् दोनों समाए हुए हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha in which people know the worlds and the treasure-chests, the waters and the brahman, within which are both non-being and being — which one, then, is he?

  11. ११

    यत्र तपः पराक्रम्य व्रतं धारयत्य् उत्तरम् ।ऋतं च यत्र श्रद्धा चापो ब्रह्म समाहिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जहाँ तप आगे बढ़कर उत्तम व्रत को धारण करता है, और जहाँ ऋत, श्रद्धा, जल तथा ब्रह्म एक साथ रखे हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha where tapas, striding forth, upholds the highest vow, where ṛta and faith, the waters and the brahman are gathered together — which one, then, is he?

  12. १२

    यस्मिन् भूमिर् अन्तरिक्षं द्यौर् यस्मिन्न् अध्य् आहिता ।यत्राग्निश् चन्द्रमाः सूर्यो वातस् तिष्ठन्त्य् आर्पिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसमें भूमि, अन्तरिक्ष और द्युलोक टिके हुए हैं, जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु जड़े हुए ठहरते हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha on which earth, mid-air and sky are set, in which Agni, the moon, the sun and the wind stand fixed — which one, then, is he?

  13. १३

    यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे सर्वे समाहिताः ।स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसके अंग में तैंतीसों देव एक साथ रखे हुए हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha in whose body all the thirty-three gods are joined together — which one, then, is he?

  14. १४

    यत्र ŕ̥षयः प्रथमजा ŕ̥चः साम यजुर् मही ।एकर्षिर् यस्मिन्न् आर्पितः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जहाँ सबसे पहले उत्पन्न ऋषि, ऋचाएँ, साम, यजुस् और मही हैं, जिसमें एकर्षि जड़ा हुआ है — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha where the first-born seers are, the verses, the sāman, the yajus and the great one, in which the sole seer is fixed — which one, then, is he?

  15. १५

    यत्राम्ŕ̥तं च मृत्युश् च पुरुषे ऽधि समाहिते ।समुद्रो यस्य नाड्यः᳙ पुरुषे ऽधि समाहिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जहाँ अमृत और मृत्यु — दोनों पुरुष में एक साथ रखे हैं, और जिसकी नाड़ियाँ समुद्र हैं, जो पुरुष में स्थापित हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha where immortality and death are joined in the Puruṣa, whose veins, the ocean, are set in the Puruṣa — which one, then, is he?

  16. १६

    यस्य चतस्रः प्रदिशो नाड्य᳙स् तिष्ठन्ति प्रथमाः ।यज्ञो यत्र पराक्रान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसकी चार दिशाएँ पहली नाड़ियों के रूप में ठहरी हैं, और जहाँ यज्ञ आगे बढ़ चुका है — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha whose four quarters stand as his first veins, in which the yajna strode forth — which one, then, is he?

  17. १७

    ये पुरुषे ब्रह्म विदुस् ते विदुः परमेष्ठिनम् ।यो वेद परमेष्ठिनं यश् च वेद प्रजापतिम् ।ज्येष्ठं ये ब्राह्मणं विदुस् ते स्कम्भम् अनुसंविदुः

    जो पुरुष में ब्रह्म को जानते हैं, वे परमेष्ठी को जानते हैं; जो परमेष्ठी को जानता है और जो प्रजापति को जानता है — जो ज्येष्ठ ब्रह्म को जानते हैं, वे स्कम्भ को भी जान लेते हैं।

    Those who know the brahman in the Puruṣa know Parameṣṭhin; he who knows Parameṣṭhin and he who knows Prajāpati, those who know the chief brahman — they come to know Skambha as well.

  18. १८

    यस्य शिरो वैश्वानरश् चक्षुर् अङ्गिरसो ऽभवन् ।अङ्गानि यस्य यातवः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसका सिर वैश्वानर हुआ, जिसकी आँखें अङ्गिरस् हुए, और जिसके अंग यातु हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha whose head is Vaiśvānara, whose eye the Aṅgirases became, whose limbs are the yātus — which one, then, is he?

  19. १९

    यस्य ब्रह्म मुखम् आहुर् जिह्वां मधुकशाम् उत ।विराजम् ऊधो यस्याहुः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसका मुख ब्रह्म कहा जाता है, जीभ मधुकशा कही जाती है, और जिसका ऊधस् (स्तन) विराज् कहा जाता है — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha whose mouth, they say, is the brahman, whose tongue is the honey-whip, whose udder is Virāj — which one, then, is he?

  20. २०

    यस्माद् ŕ̥चो अपातक्षन् यजुर् यस्माद् अपाकषन् ।सामानि यस्य लोमान्य् अथर्वाङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः ॥२०॥ {२३}

    जिससे ऋचाओं को छीलकर निकाला गया, जिससे यजुस् को खुरचकर निकाला गया, जिसके रोएँ साम हैं और जिसका मुख अथर्वाङ्गिरस् है — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha from whom they carved the verses and scraped off the yajus, whose hairs are the sāmans and whose mouth the Atharvāṅgirases — which one, then, is he?

  21. २१

    असच्चाखां प्रतिष्ठन्तीं परमम् इव जना विदुः ।उतो सन् मन्यन्ते ऽवरे ये ते शाखाम् उपासते

    जो शाखा असत् है और फिर भी टिकी हुई है, उसे लोग मानो परम समझते हैं; और जो निम्न लोग उस शाखा की उपासना करते हैं, वे उसे सत् मानते हैं।

    People know the branch of non-being that juts forth as if it were the highest; (To Skambha:) and the lesser ones who worship your branch think of it as being.

  22. २२

    यत्रादित्याश् च रुद्राश् च वसवश् च समाहिताः ।भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जहाँ आदित्य, रुद्र और वसु एक साथ रखे हुए हैं, जहाँ भूत और भविष्य तथा सब लोक प्रतिष्ठित हैं — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha in which the Ādityas, Rudras and Vasus are gathered, in which past and future and all the worlds are established — which one, then, is he?

  23. २३

    यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा ।निधिं तम् अद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ

    जिसकी निधि की रक्षा तैंतीसों देव सदा करते हैं — हे देवो, जिस निधि की तुम रक्षा करते हो, उसे आज कौन जानता है?

    Whose treasure the thirty-three gods always guard — who today knows that treasure which you gods protect?

  24. २४

    यत्र देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म ज्येष्ठम् उपासते ।यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स ब्रह्मा वेदिता स्यात्

    जहाँ ब्रह्म को जानने वाले देव ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं — जो उन्हें प्रत्यक्ष जान ले, वही ब्रह्मा और सचमुच जानने वाला होगा।

    Where the gods who know the brahman worship the highest brahman — whoever knows them directly would be a brahmā (a priest who knows the brahman) who truly knows.

  25. २५

    बृहन्तो नाम ते देवा ये ऽसतः परि जज्ञिरे ।एकं तद् अङ्गं स्कम्भस्यासद् आहुः परो जनाः

    'बृहन्त' नाम के वे देव हैं जो असत् से उत्पन्न हुए। लोग कहते हैं कि स्कम्भ का वह एक अंग असत् है, सबसे परे।

    Great by name are those gods who were born out of non-being; people say that non-being is one limb of Skambha, the one beyond.

  26. २६

    यत्र स्कम्भः प्रजनयन् पुराणं व्यवर्तयत् ।एकं तद् अङ्गं स्कम्भस्य पुराणम् अनुसंविदुः

    जहाँ स्कम्भ ने उत्पन्न करते हुए पुराण (प्राचीन सृष्टि) को फैलाया — स्कम्भ के उस एक अंग को ही लोग 'पुराण' जानते हैं।

    Where Skambha, bringing forth, set the ancient one turning — that ancient one, they know, is one limb of Skambha.

  27. २७

    यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे ।तान् वै त्रयस्त्रिंशद् देवान् एके ब्रहम्विदो विदुः

    जिसके अंग में तैंतीसों देवों ने अवयवों को आपस में बाँट लिया — उन तैंतीस देवों को कुछ ही ब्रह्मवेत्ता जानते हैं।

    In whose body the thirty-three gods divided the members among themselves — those thirty-three gods only some knowers of brahman know.

  28. २८

    हिरण्यगर्भम् परमम् अनत्युद्यं जना विदुः ।स्कम्भस् तद् अग्रे प्रासिञ्चद् धिरण्यं लोके अन्तरा

    लोग हिरण्यगर्भ को परम और अवर्णनीय जानते हैं; स्कम्भ ने आरम्भ में उस हिरण्य (स्वर्ण) को लोक के भीतर उँडेला।

    People know Hiraṇyagarbha as supreme, beyond all speaking; yet in the beginning it was Skambha who poured out that gold in the midst of the world.

  29. २९

    स्कम्भे लोकाः स्कम्भे तपः स्कम्भे ऽध्य् ऋतम् आहितम् ।स्कम्भ त्वा वेद प्रत्यक्षम् इन्द्रे सर्वं समाहितम्

    स्कम्भ में लोक हैं, स्कम्भ में तप है, स्कम्भ में ऋत रखा हुआ है। हे स्कम्भ, मैं तुझे प्रत्यक्ष जानता हूँ — इन्द्र में सब कुछ एक साथ रखा है।

    In Skambha are the worlds, in Skambha tapas, in Skambha ṛta is placed. Skambha, I know you directly: in Indra everything is gathered.

  30. ३०

    इन्द्रे लोका इन्द्रे तप इन्द्रे ऽध्य् ऋतम् आहितम् ।इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥३०॥ {२४}

    इन्द्र में लोक हैं, इन्द्र में तप है, इन्द्र में ऋत रखा हुआ है। हे इन्द्र, मैं तुझे प्रत्यक्ष जानता हूँ — स्कम्भ में सब कुछ प्रतिष्ठित है।

    In Indra are the worlds, in Indra tapas, in Indra ṛta is placed. Indra, I know you directly: on Skambha everything is established.

  31. ३१

    नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषसः ।यद् अजः प्रथमं संबभूव स ह तत् स्वराज्यम् इयाय यस्मान् नान्यत् परम् अस्ति भूतम्

    सूर्य से पहले, उषस् से पहले, नाम नाम को बार-बार पुकारता है। जो अज (अजन्मा) सबसे पहले उत्पन्न हुआ, वही उस स्वराज्य को प्राप्त हुआ जिससे परे कोई दूसरी सत्ता नहीं है।

    Before the sun, before Ushas, he calls out name after name. When the Unborn first came into being, he reached that self-rule than which nothing higher exists.

  32. ३२

    यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षम् उतोदरम् ।दिवं यश् चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः

    जिसकी भूमि माप है और अन्तरिक्ष उदर है, जिसने द्युलोक को अपना सिर बनाया — उस ज्येष्ठ ब्रह्म को नमस्कार।

    Whose foundation is the earth, whose belly the mid-air, who made the sky his head — homage to that highest brahman.

  33. ३३

    यस्य सूर्यश् चक्षुश् चन्द्रमाश् च पुनर्णवः ।अग्निं यश् चक्र आस्यं᳙ तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः

    जिसका नेत्र सूर्य है और बार-बार नया होने वाला चन्द्रमा भी, जिसने अग्नि को अपना मुख बनाया — उस ज्येष्ठ ब्रह्म को नमस्कार।

    Whose eye is the sun and the ever-renewed moon, who made Agni his mouth — homage to that highest brahman.

  34. ३४

    यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुर् अङ्गिरसो ऽभवन् ।दिशो यश् चक्रे प्रज्ञानीस् तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः

    जिसका प्राण और अपान वायु है, जिसकी आँखें अङ्गिरस् हुए, जिसने दिशाओं को पहचान का साधन बनाया — उस ज्येष्ठ ब्रह्म को नमस्कार।

    Whose in-breath and out-breath is the wind, whose eye the Aṅgirases became, who made the quarters his organs of perception — homage to that highest brahman.

  35. ३५

    स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्व् अ᳙न्तरिक्षम् ।स्कम्भो दाधार प्रदिशः षड् उर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनम् आ विवेश

    स्कम्भ ने इन दोनों — द्यावा और पृथिवी — को धारण किया, स्कम्भ ने विस्तृत अन्तरिक्ष को धारण किया। स्कम्भ ने छहों विस्तृत दिशाओं को धारण किया; स्कम्भ ही इस समस्त भुवन में प्रविष्ट हुआ।

    Skambha holds up both these, heaven and earth; Skambha holds up the wide mid-air. Skambha holds up the six wide directions; Skambha has entered this whole world.

  36. ३६

    यः श्रमात् तपसो जातो लोकान्त् सर्वान्त् समानशे ।सोमं यश् चक्रे केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः

    जो श्रम और तप से उत्पन्न होकर सब लोकों में व्याप्त हो गया, जिसने सोम को पूरी तरह अपना बनाया — उस ज्येष्ठ ब्रह्म को नमस्कार।

    He who, born of toil and tapas, pervaded all the worlds, who made Soma his own alone — homage to that highest brahman.

  37. ३७

    कथं वातो नेलयति कथं न रमते मनः ।किम् आपः सत्यं प्रेप्सन्तीर् नेलयन्ति कदा चन

    वायु क्यों नहीं ठहरता? मन क्यों नहीं ठहरता? सत्य तक पहुँचने की इच्छा से चलते हुए जल कभी क्यों नहीं रुकते?

    How is it that the wind never rests? How is it that the mind finds no rest? Why do the waters, seeking truth, never stand still?

  38. ३८

    महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं सलिलस्य पृष्ठे ।तस्मिन् छ्रयन्ते य उ के च देवा वृक्षस्य स्कन्धः परित इव शाखाः

    भुवन के मध्य में, सलिल की पीठ पर तप में स्थित एक महान् यक्ष है। जितने भी देव हैं, वे सब उसी का आश्रय लेते हैं — जैसे वृक्ष के तने के चारों ओर शाखाएँ।

    A great wonder (yakṣa) stands in the middle of the world, striding in tapas on the back of the waters. Whatever gods there are rest on it, like branches all around a tree's trunk.

  39. ३९

    यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षुषा ।यस्मै देवाः सदा बलिं प्रयछन्ति विमिते ऽमितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विद् एव सः

    जिसे हाथों से, पैरों से, वाणी से, कान से और आँख से, तथा जिसे देव सदा बलि अर्पित करते हैं — जो मापे हुए में अमाप है — उस स्कम्भ को बताओ, वह कौन-सा है?

    Tell me of that Skambha to whom the gods always bring tribute with hands and feet, with speech, ear and eye — unmeasured tribute in a measured place — which one, then, is he?

  40. ४०

    अप तस्य हतं तमो व्यावृत्तः स पाप्मना ।सर्वाणि तस्मिन् ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ

    उसका अन्धकार नष्ट हो गया, वह पाप से अलग हो गया; उसमें वे सब ज्योतियाँ हैं जो तीन ज्योतियाँ प्रजापति में हैं।

    His darkness is struck away; he is set apart from evil. In him are all the lights, the three that are in Prajāpati.

  41. ४१

    यो वेतसं हिरण्ययं तिष्ठन्तं सलिले वेद ।स वै गुह्यः प्रजापतिः

    जो सलिल में खड़े हुए सुनहरे वेतस (नरकट) को जानता है — वही गुह्य प्रजापति है।

    He who knows the golden reed standing in the waters is himself the hidden Prajāpati.

  42. ४२

    तन्त्रम् एके युवती विरूपे अभ्याक्रामं वयतः षण्मयूखम् ।प्रान्या तन्तूंस् तिरते धत्ते अन्या नाप वृञ्जाते न गमातो अन्तम्

    भिन्न रूप वाली दो युवतियाँ मिलकर छह खूँटों वाले ताने को बुनती हैं। एक तन्तुओं को आगे बढ़ाती है, दूसरी उन्हें थामती है; वे न तो उन्हें तोड़ती हैं और न ही उनके अन्त तक पहुँचती हैं।

    Two lone young women of different forms, stepping up in turn, weave a web on six pegs. One draws the threads forward, the other sets them in place; they never break off and never reach the end.

  43. ४३

    तयोर् अहं परिन्ŕ̥त्यन्त्योर् इव न वि जानामि यतरा परस्तात् ।पुमान् एनद् वयत्य् उद् गृणन्ति पुमान् एनद् वि जभाराधि नाके

    मानो चारों ओर नाचती हुई उन दोनों में मैं नहीं जान पाता कि कौन आगे है। कोई पुरुष इसे बुनता है और ऊपर खींचते हैं; पुरुष ने ही इसे नाक (द्युलोक) पर फैलाया।

    Of the two, as if dancing around, I cannot tell which comes first. A male weaves this and ties it off; a male has spread it out upon the vault of heaven.

  44. ४४

    इमे मयूखा उप तस्तभुर् दिवं सामानि चक्रुस् तसराणि वातवे ॥४४॥ {२५}

    इन खूँटों ने द्युलोक को ऊपर थाम रखा है; बुनने के लिए सामों को तसर (ढरकी) बना लिया गया।

    These pegs propped up the sky; they made the sāmans into shuttles for the weaving.