ऋग्वेदRigvedaRV 8.1

इन्द्र:

ऋषिRishi(३४) १-२ प्रगाथो ( घौर : ) काण्व: ; ३-२९ मेघातिथि – मेध्यातिथी काण्वौ, ३०-३३ प्लायोगिरासङ्ग:, ३४ आङ्गिरसी शश्वती ऋषिकादेवताDevataइन्द्र:,३० -३४ आसङ्ग:छन्दMetre१-४ प्रगाथ:= ( विषमा बृहती, समा सतोबृहती ), ५-३२ बृहती, ३३-३४ त्रिष्टुप्

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    मा चि॑द॒न्यद्वि शं॑सत॒ सखा॑यो॒ मा रि॑षण्यत ।इन्द्र॒मित्स्तो॑ता॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते मुहु॑रु॒क्था च॑ शंसत

    हे मित्रों, किसी दूसरे की स्तुति मत करो, चूक मत करो; सोम निकल जाने पर मिलकर उस वृषभ-रूप इन्द्र की ही स्तुति करो और बार-बार उक्थ (स्तोत्र) बोलो।

    Friends, praise nothing else, and do not come to harm. Praise only Indra, the bull, together at the pressed soma, and recite hymns again and again.

  2. २

    अ॒व॒क्र॒क्षिणं॑ वृष॒भं य॑था॒जुरं॒ गां न च॑र्षणी॒सह॑म् ।वि॒द्वेष॑णं सं॒वन॑नोभयंक॒रं मंहि॑ष्ठमुभया॒विन॑म्

    वह आक्रमणशील वृषभ है, बैल की तरह कभी बूढ़ा न होने वाला, मनुष्यों को वश में करने वाला; शत्रुओं में वैर डालने और अपनों को जोड़ने वाला, दोनों काम करने वाला, अत्यन्त उदार और दोनों प्रकार के धन का स्वामी।

    Praise him who charges down like a bull, unaging, who overpowers peoples like a bull; who brings both enmity and concord, who acts for both sides, the most generous, rich in both kinds of goods.

  3. ३

    यच्चि॒द्धि त्वा॒ जना॑ इ॒मे नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑ ।अ॒स्माकं॒ ब्रह्मे॒दमि॑न्द्र भूतु॒ तेऽहा॒ विश्वा॑ च॒ वर्ध॑नम्

    हे इन्द्र, यद्यपि ये लोग भिन्न-भिन्न जगहों से तुझे सहायता के लिए बुलाते हैं, तो भी हमारा यही स्तोत्र तेरा हो और सब दिनों में तेरी वृद्धि करे।

    Even though these people call on you in many different ways for help, Indra, let this sacred formulation of ours be what strengthens you, through all the days.

  4. ४

    वि त॑र्तूर्यन्ते मघवन्विप॒श्चितोऽ॒र्यो विपो॒ जना॑नाम् ।उप॑ क्रमस्व पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑

    हे मघवन्, मनुष्यों के मेधावी स्तोता एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ करते हैं। तू हमारे पास आ और सहायता के लिए बहुरूप, सबसे निकट (शीघ्र मिलने वाला) बल-अन्न ले आ।

    Bountiful one, the inspired poets keep outdoing the inspired words of the stranger among the peoples. Step close and bring us a prize of many forms, as near as possible, for our help.

  5. ५

    म॒हे च॒न त्वाम॑द्रिवः॒ परा॑ शु॒ल्काय॑ देयाम् ।न स॒हस्रा॑य॒ नायुता॑य वज्रिवो॒ न श॒ताय॑ शतामघ

    हे वज्रधर, बड़े मूल्य पर भी मैं तुझे न दूँ; हे वज्रवान्, न हजार के बदले, न दस हजार के बदले, हे सैकड़ों धन वाले, न सौ के बदले।

    Not even for a great price would I give you away, lord of the pressing stone: not for a thousand, not for ten thousand, vajra-wielder, not for a hundred, you whose bounty is a hundredfold.

  6. ६

    वस्याँ॑ इन्द्रासि मे पि॒तुरु॒त भ्रातु॒रभु॑ञ्जतः ।मा॒ता च॑ मे छदयथः स॒मा व॑सो वसुत्व॒नाय॒ राध॑से

    हे इन्द्र, तू मेरे पिता से और कुछ न देने वाले भाई से भी अधिक श्रेष्ठ है; हे वसो, तू और मेरी माता — तुम दोनों मुझे धन और दान के लिए समान रूप से तृप्त करते हो।

    Indra, you are better to me than a father, and better than a brother who does not provide for me. You and my mother, good one, seem alike to me in granting wealth and generosity.

  7. ७

    क्वे॑यथ॒ क्वेद॑सि पुरु॒त्रा चि॒द्धि ते॒ मनः॑ ।अल॑र्षि युध्म खजकृत्पुरंदर॒ प्र गा॑य॒त्रा अ॑गासिषुः

    तू कहाँ चला गया, कहाँ है? तेरा मन तो अनेक जगहों में लगा रहता है। हे योद्धा, संग्राम मचाने वाले, पुरभेदी इन्द्र — तू दौड़ कर आ; गायत्र-साम गाये जा चुके हैं।

    Where have you gone? Where are you? Your mind is in many places. Hurry here, warrior, maker of battle-din, breaker of strongholds. The gāyatra songs have been sung.

  8. ८

    प्रास्मै॑ गाय॒त्रम॑र्चत वा॒वातु॒र्यः पु॑रंद॒रः ।याभिः॑ का॒ण्वस्योप॑ ब॒र्हिरा॒सदं॒ यास॑द्व॒ज्री भि॒नत्पुरः॑

    इस इन्द्र के लिए गायत्र-साम गाओ, जो अपने प्रिय भक्त का पुरभेदी सहायक है — जिन सहायताओं से वह वज्रधारी कण्व-पुत्र के बर्हि पर बैठने आये और शत्रुओं के पुर तोड़े।

    Sing a gāyatra song to him, the stronghold-breaker of his devoted worshipper. With these songs the vajra-bearer will come to sit on the Kāṇva's sacrificial grass, and he will break strongholds.

  9. ९

    ये ते॒ सन्ति॑ दश॒ग्विनः॑ श॒तिनो॒ ये स॑ह॒स्रिणः॑ ।अश्वा॑सो॒ ये ते॒ वृष॑णो रघु॒द्रुव॒स्तेभि॑र्न॒स्तूय॒मा ग॑हि

    तेरे जो घोड़े दस-दस, सौ और हजार की संख्या वाले हैं, जो बलवान् और तेज दौड़ने वाले हैं — उन्हीं के साथ तू शीघ्र हमारे पास आ।

    With your horses in tens, in hundreds and in thousands, your bullish, swift-running horses, come to us quickly.

  10. १०

    आ त्व१॒॑द्य स॑ब॒र्दुघां॑ हु॒वे गा॑य॒त्रवे॑पसम् ।इन्द्रं॑ धे॒नुं सु॒दुघा॒मन्या॒मिष॑मु॒रुधा॑रामरं॒कृत॑म्

    आज मैं तुझे बुलाता हूँ — मधुर दूध देने वाली धेनु के समान, गायत्र-गान से कँपने वाले इन्द्र को; जो एक अनोखी सुखदोह्या गाय है, अन्न देने वाला, चौड़ी धारा वाला और अलंकृत।

    Today I call here the cow that yields nectar, whose inspiration is the gāyatra song: Indra, the milk-cow that is easy to milk, unfailing refreshment, flowing in broad streams, ready for use.

  11. ११

    यत्तु॒दत्सूर॒ एत॑शं व॒ङ्कू वात॑स्य प॒र्णिना॑ ।वह॒त्कुत्स॑मार्जुने॒यं श॒तक्र॑तुः॒ त्सर॑द्गन्ध॒र्वमस्तृ॑तम्

    जब सूर्य ने एतश को आगे धकेला, तब शतक्रतु इन्द्र वायु के दो चंचल पंखों जैसे (अश्वों) से अर्जुनी-पुत्र कुत्स को ले चला और अजेय गन्धर्व पर चुपके से जा पड़ा।

    When Sūra drove on Etaśa with the two curved, winged steeds of the wind, Śatakratu carried Kutsa, son of Arjunī, and stole up on the unassailable Gandharva.

  12. १२

    य ऋ॒ते चि॑दभि॒श्रिषः॑ पु॒रा ज॒त्रुभ्य॑ आ॒तृदः॑ ।संधा॑ता सं॒धिं म॒घवा॑ पुरू॒वसु॒रिष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑

    जो पट्टी बाँधे बिना ही, हंसली की हड्डियाँ बिंधने से पहले ही, टूटे जोड़ को जोड़ देने वाला है — वही मघवान्, बहुधनी इन्द्र मुड़े-बिगड़े अंग को फिर ठीक कर देता है।

    He who, even without a binding, before the collarbones are pierced, joins the joint together—the bountiful one, rich in goods—sets right again what has been dislocated.

  13. १३

    मा भू॑म॒ निष्ट्या॑ इ॒वेन्द्र॒ त्वदर॑णा इव ।वना॑नि॒ न प्र॑जहि॒तान्य॑द्रिवो दु॒रोषा॑सो अमन्महि

    हे इन्द्र, हम तुझसे परदेसी या अजनबी जैसे न हो जाएँ, न छोड़ दिए गए वृक्षों की तरह सूख जाएँ; हे अद्रिवन्, (कष्ट में भी) अटल रहकर हमने तेरी स्तुति की है।

    Indra, may we not be like outcasts, like strangers to you. Like trees left standing, lord of the stone, we have thought ourselves hard to burn.

  14. १४

    अम॑न्म॒हीद॑ना॒शवोऽ॑नु॒ग्रास॑श्च वृत्रहन् ।स॒कृत्सु ते॑ मह॒ता शू॑र॒ राध॑सा॒ अनु॒ स्तोमं॑ मुदीमहि

    हे वृत्रहन्, हमने तेरी स्तुति की है — हम मन्दगति और निर्बल हैं; हे शूर, तेरे महान् दान से एक बार तो हम अपने स्तोत्र के फलस्वरूप आनन्द पाएँ।

    Slayer of Vṛtra, we have thought ourselves slow and weak. Hero, may we for once rejoice fully in your great bounty, in keeping with our praise.

  15. १५

    यदि॒ स्तोमं॒ मम॒ श्रव॑द॒स्माक॒मिन्द्र॒मिन्द॑वः ।ति॒रः प॒वित्रं॑ ससृ॒वांस॑ आ॒शवो॒ मन्द॑न्तु तुग्र्या॒वृधः॑

    यदि वह मेरी स्तुति सुन ले — तो छन्नी को पार कर बहे हुए ये शीघ्रगामी सोम-बिन्दु, तुग्र्य को बढ़ाने वाले, हमारे इन्द्र को मदमत्त करें।

    If he hears my praise, let our soma drops, which have flowed swiftly through the filter, delight Indra—drops that give strength with water.

  16. १६

    आ त्व१॒॑द्य स॒धस्तु॑तिं वा॒वातुः॒ सख्यु॒रा ग॑हि ।उप॑स्तुतिर्म॒घोनां॒ प्र त्वा॑व॒त्वधा॑ ते वश्मि सुष्टु॒तिम्

    आज तू अपने प्रिय सखा की सम्मिलित स्तुति में आ; दानी यजमानों की उपस्तुति तुझे आगे बढ़ाये — और मैं तेरी सुन्दर स्तुति करना चाहता हूँ।

    Come today to the shared praise of your devoted friend. Let the patrons' praise of you spur you on. Now I want a fine praise-song for you.

  17. १७

    सोता॒ हि सोम॒मद्रि॑भि॒रेमे॑नम॒प्सु धा॑वत ।ग॒व्या वस्त्रे॑व वा॒सय॑न्त॒ इन्नरो॒ निर्धु॑क्षन्व॒क्षणा॑भ्यः

    पत्थरों से सोम को कूटो और उसे जल में धो डालो; हे पुरुषो, गोदुग्ध से उसे वस्त्र की तरह ढँकते हुए उसका रस कोषों से दुह लो।

    Press the soma with the stones and rinse it in the waters. Clothing it with cow's milk as if with garments, the men milk it out of the channels.

  18. १८

    अध॒ ज्मो अध॑ वा दि॒वो बृ॑ह॒तो रो॑च॒नादधि॑ ।अ॒या व॑र्धस्व त॒न्वा॑ गि॒रा ममा जा॒ता सु॑क्रतो पृण

    चाहे पृथ्वी से, चाहे महान् द्युलोक के ज्योतिर्मय प्रदेश से आ; हे सुक्रतो, मेरी इस वाणी से अपने शरीर में वृद्धि पा और जो हमारी सन्तानें हैं उन्हें धन से भर दे।

    Whether you come from the earth, or from heaven, or from the high luminous realm, grow strong in body through this song of mine. Fill my people with goods, you of good resolve.

  19. १९

    इन्द्रा॑य॒ सु म॒दिन्त॑मं॒ सोमं॑ सोता॒ वरे॑ण्यम् ।श॒क्र ए॑णं पीपय॒द्विश्व॑या धि॒या हि॑न्वा॒नं न वा॑ज॒युम्

    इन्द्र के लिए अत्यन्त मादक, वरणीय सोम कूटो। शक्र इन्द्र उसे हर कर्म से पुष्ट करे — जैसे दौड़ के लिए प्रेरित किए जाते घोड़े को बढ़ाया जाता है।

    Press for Indra the choice soma, the most intoxicating. Śakra will make it swell with every insight, like a man urging on a horse eager for the prize.

  20. २०

    मा त्वा॒ सोम॑स्य॒ गल्द॑या॒ सदा॒ याच॑न्न॒हं गि॒रा ।भूर्णिं॑ मृ॒गं न सव॑नेषु चुक्रुधं॒ क ईशा॑नं॒ न या॑चिषत्

    सोम अर्पित करते हुए वाणी से सदा माँगते रहकर मैं तुझे क्रुद्ध न कर दूँ — जैसे सवनों में कोई चंचल वन्य पशु को भड़का देता है; फिर भी ऐसा कौन है जो समर्थ स्वामी से न माँगे?

    May I not, always begging with song at the gush of soma, anger you at the pressings, as one angers a fierce wild beast. Who would not ask of a lord?

  21. २१

    मदे॑नेषि॒तं मद॑मु॒ग्रमु॒ग्रेण॒ शव॑सा ।विश्वे॑षां तरु॒तारं॑ मद॒च्युतं॒ मदे॒ हि ष्मा॒ ददा॑ति नः

    मद से प्रेरित, उग्र बल से उग्र मदवाले, सबसे आगे निकल जाने वाले, मद में झूमते इन्द्र की (स्तुति करो) — क्योंकि मद में ही वह हमें धन देता है।

    For in his intoxication he gives us an intoxication roused by intoxication, mighty with mighty strength, the one that overcomes all, that shakes the drunken foe.

  22. २२

    शेवा॑रे॒ वार्या॑ पु॒रु दे॒वो मर्ता॑य दा॒शुषे॑ ।स सु॑न्व॒ते च॑ स्तुव॒ते च॑ रासते वि॒श्वगू॑र्तो अरिष्टु॒तः

    सुखकारी निधि में वह देव हवि देने वाले मनुष्य के लिए बहुत वांछनीय वस्तुएँ रखता है; सब से प्रशंसित और स्तोताओं से स्तुत वह सोम निकालने वाले और स्तुति करने वाले — दोनों को धन देता है।

    From his treasury the god grants many desirable things to the mortal who worships him. He gives to the one who presses soma and to the one who praises, he who is welcomed by all and praised by the stranger.

  23. २३

    एन्द्र॑ याहि॒ मत्स्व॑ चि॒त्रेण॑ देव॒ राध॑सा ।सरो॒ न प्रा॑स्यु॒दरं॒ सपी॑तिभि॒रा सोमे॑भिरु॒रु स्फि॒रम्

    हे इन्द्र, आ, आनन्द ले; हे देव, अपने विचित्र दान के साथ आ। तू सरोवर की तरह अपने चौड़े-फूले पेट को, साथ पीने वालों सहित, सोमों से भर लेता है।

    Come, Indra, and become drunk, god, with your brilliant bounty. Together with your fellow drinkers, fill your broad, swelling belly with soma, like a lake.

  24. २४

    आ त्वा॑ स॒हस्र॒मा श॒तं यु॒क्ता रथे॑ हिर॒ण्यये॑ ।ब्र॒ह्म॒युजो॒ हर॑य इन्द्र के॒शिनो॒ वह॑न्तु॒ सोम॑पीतये

    हे इन्द्र, सोने के रथ में जुते हजार और सौ हरि-अश्व, जो स्तोत्र से ही जुत जाते हैं और घनी अयाल वाले हैं, तुझे सोमपान के लिए ले आएँ।

    Let a thousand, a hundred tawny horses, yoked to your golden chariot, yoked by the sacred formulation, long-maned, bring you here, Indra, to drink soma.

  25. २५

    आ त्वा॒ रथे॑ हिर॒ण्यये॒ हरी॑ म॒यूर॑शेप्या ।शि॒ति॒पृ॒ष्ठा व॑हतां॒ मध्वो॒ अन्ध॑सो वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये॑

    सोने के रथ में जुते दो हरि, जिनकी पूँछ मोर जैसी और पीठ सफेद है, तुझे मधुर, बलवर्धक सोम-रस के पान के लिए ले आएँ।

    Let your two tawny horses, peacock-tailed and white-backed, bring you in your golden chariot to drink the sweet, invigorating stalk.

  26. २६

    पिबा॒ त्व१॒॑स्य गि॑र्वणः सु॒तस्य॑ पूर्व॒पा इ॑व ।परि॑ष्कृतस्य र॒सिन॑ इ॒यमा॑सु॒तिश्चारु॒र्मदा॑य पत्यते

    हे स्तुति-प्रिय, इस निचोड़े हुए सोम को तू पहले पीने वाले की तरह पी; यह शुद्ध किया हुआ रसीला पेय सुन्दर है और तेरे मद के लिए तैयार है।

    Drink this pressed soma, you who long for songs, as if you were the first to drink. This pressing of the adorned, juicy soma is lovely and fit for intoxication.

  27. २७

    य एको॒ अस्ति॑ दं॒सना॑ म॒हाँ उ॒ग्रो अ॒भि व्र॒तैः ।गम॒त्स शि॒प्री न स यो॑ष॒दा ग॑म॒द्धवं॒ न परि॑ वर्जति

    जो अपने कर्मों में अकेला ही महान् और व्रतों में उग्र है — वह सुन्दर जबड़ों वाला इन्द्र आए, दूर न रहे; वह आए और हमारे आह्वान को टाल न दे।

    He who alone is great in wondrous deeds, mighty beyond others in his ways—may that full-jawed one come. May he not stay away; may he come and not pass by our call.

  28. २८

    त्वं पुरं॑ चरि॒ष्ण्वं॑ व॒धैः शुष्ण॑स्य॒ सं पि॑णक् ।त्वं भा अनु॑ चरो॒ अध॑ द्वि॒ता यदि॑न्द्र॒ हव्यो॒ भुवः॑

    तूने शुष्ण के चलते-फिरते पुर को अपने आयुधों से चूर कर डाला; तू ज्योति के मार्ग पर चला, और तब से, हे इन्द्र, तू आह्वान के योग्य हुआ।

    With your weapons you smashed Śuṣṇa's moving stronghold. Then you followed the lights, Indra, when you became twice worthy of invocation.

  29. २९

    मम॑ त्वा॒ सूर॒ उदि॑ते॒ मम॑ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः ।मम॑ प्रपि॒त्वे अ॑पिशर्व॒रे व॑स॒वा स्तोमा॑सो अवृत्सत

    हे वसो, सूर्योदय के समय, आकाश के मध्याह्न में, दिन ढलते समय और रात में — मेरी स्तुतियाँ तुझे अपनी ओर मोड़ लाई हैं।

    Good one, my praises have turned you here: mine at sunrise, mine at midday, mine as evening comes on and at nightfall.

  30. ३०

    स्तु॒हि स्तु॒हीदे॒ते घा॑ ते॒ मंहि॑ष्ठासो म॒घोना॑म् ।नि॒न्दि॒ताश्वः॑ प्रप॒थी प॑रम॒ज्या म॒घस्य॑ मेध्यातिथे

    स्तुति कर, स्तुति कर! हे मेध्यातिथि, दानियों में ये ही तेरे लिए सबसे उदार हैं — निन्दिताश्व, प्रपथी, परमज्या — धन के स्वामी।

    Praise, praise! These are the most generous of patrons for you, Medhyātithi: Ninditāśva, Prapathin and Paramajyā, of bounty.

  31. ३१

    आ यदश्वा॒न्वन॑न्वतः श्र॒द्धया॒हं रथे॑ रु॒हम् ।उ॒त वा॒मस्य॒ वसु॑नश्चिकेतति॒ यो अस्ति॒ याद्वः॑ प॒शुः

    जब मैं श्रद्धा के साथ (दानी के दिए) घोड़े रथ में जोतकर उस पर चढ़ा — और वह सुन्दर धन का भी ध्यान रखता है, जो यदु का पशुधन है।

    When, with trust, I mounted the chariot behind the eager horses, he also took note of lovely wealth—he who owns the Yādava livestock.

  32. ३२

    य ऋ॒ज्रा मह्यं॑ माम॒हे स॒ह त्व॒चा हि॑र॒ण्यया॑ ।ए॒ष विश्वा॑न्य॒भ्य॑स्तु॒ सौभ॑गास॒ङ्गस्य॑ स्व॒नद्र॑थः

    जिसने सुनहरी खाल के साथ मुझे दो लाल घोड़े दिए — आसङ्ग का वह गरजते रथ वाला दानी सब सौभाग्य प्राप्त करे।

    He who gave me ruddy horses together with a golden covering—may this Āsaṅga, whose chariot thunders, surpass all good fortunes.

  33. ३३

    अध॒ प्लायो॑गि॒रति॑ दासद॒न्याना॑स॒ङ्गो अ॑ग्ने द॒शभिः॑ स॒हस्रैः॑ ।अधो॒क्षणो॒ दश॒ मह्यं॒ रुश॑न्तो न॒ळा इ॑व॒ सर॑सो॒ निर॑तिष्ठन्

    हे अग्नि, प्लायोग का पुत्र आसङ्ग दस सहस्र के दान से सब दूसरों से आगे निकल गया; और मेरे लिए दस श्वेत बैल खड़े हुए, जैसे सरोवर से नरकट उठ आते हैं।

    Then Plāyogi Āsaṅga outdid the others with ten thousand gifts, Agni. Then ten shining oxen rose up for me, like reeds out of a lake.

  34. ३४

    अन्व॑स्य स्थू॒रं द॑दृशे पु॒रस्ता॑दन॒स्थ ऊ॒रुर॑व॒रम्ब॑माणः ।शश्व॑ती॒ नार्य॑भि॒चक्ष्या॑ह॒ सुभ॑द्रमर्य॒ भोज॑नं बिभर्षि

    उसका स्थूल अंग आगे लटकता दिखाई पड़ा — हड्डी-रहित जंघा की तरह झूलता हुआ। उसे देखकर शश्वती नामक नारी ने कहा — “हे आर्य, तू बड़ा ही कल्याणकारी पोषण धारण करता है।”

    His stout member has appeared in front, hanging down like a boneless thigh. Seeing it, the woman Śaśvatī said: 'Noble man, you carry a splendid means of pleasure.'