अथर्ववेदAtharvavedaAV 10.2
मनुष्य-देह का रचयिता कौनWho fashioned the human body
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- १
केन पार्ष्णी आभृते पूरुषस्य केन मांसं संभृतं केन गुल्फौ ।केनाङ्गुलीः पेशनीः केन खानि केनोच्छ्लङ्खौ मध्यतः कः प्रतिष्ठाम्
मनुष्य की दोनों एड़ियाँ किसने लाकर रखीं, माँस किसने जोड़ा, टखने किसने बनाए? सुघड़ उँगलियाँ किसने, शरीर के छिद्र किसने, बीच के उच्छ्लङ्ख किसने बनाए, और खड़े रहने का आधार किसने दिया?
Who brought together a man's heels? Who assembled his flesh, who his ankles? Who made his shapely fingers, who his openings, who the two ucchlankhas, and who gave him support in the middle?
- २
कस्मान् नु गुल्फाव् अधराव् अकृण्वन्न् अष्ठीवन्ताव् उत्तरौ पुरुषस्य ।जङ्घे निर्ŕ̥त्य न्य् अ᳙दधुः क्व᳙ स्विज् जानुनोः संधी क उ तच् चिकेत
उन्होंने मनुष्य के टखनों को नीचे और घुटनों की चपनियों को ऊपर किससे बनाया? पिंडलियों को अलग-अलग करके नीचे रखा — पर घुटनों की संधि कहाँ है, यह कौन समझ पाया है?
From what did they make a man's ankles below and his knees above? Having set the shanks apart, where did they fix them, and where are the joints of the knees? Who has understood that?
- ३
चतुष्टयं युजते संहितान्तं जानुभ्याम् ऊर्ध्वं शिथिरं कबन्धम् ।श्रोणी यद् ऊरू क उ तज् जजान याभ्यां कुसिन्धं सुदृढं बभूव
सिरों पर जुड़ा हुआ चार अंगों वाला ढाँचा आपस में जुड़ता है; घुटनों से ऊपर धड़ ढीला रहता है। कूल्हे और जाँघें किसने उत्पन्न कीं, जिनसे शरीर का ढाँचा इतना दृढ़ हो गया?
A fourfold frame with joined ends is fitted together above the knees, the loose trunk. The hips and thighs, by which the body became firm: who brought them into being?
- ४
कति देवाः कतमे त आसन् य उरो ग्रीवाश् चिक्युः पुरुषस्य ।कति स्तनौ व्य् अ᳙दधुः कः कफोदौ कति स्कन्धान् कति पृष्टीर् अचिन्वन्
कितने देव थे और वे कौन थे जिन्होंने मनुष्य का वक्ष और गर्दन रचे? कितनों ने दोनों स्तन रखे, किसने हँसलियाँ बनाईं, कितनों ने कंधे और कितनों ने पसलियाँ जोड़ीं?
How many gods were there, and which, who built up a man's chest and neck? How many set his breasts in place, who his kaphodas? How many built his shoulders, how many his ribs?
- ५
को अस्य बाहू सम् अभरद् वीर्यां᳙ करवाद् इति ।अंसौ को अस्य तद् देवः कुसिन्धे अध्य् आ दधौ
किसने उसकी दोनों भुजाएँ जोड़ीं, यह सोचकर कि 'यह वीरता के काम करे'? और किस देव ने उसके कंधों को धड़ पर टिकाया?
Who joined his two arms together, so that he would do heroic deeds? Which god set his shoulders on the trunk?
- ६
कः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि कर्णाव् इमौ नासिके चक्षणी मुखम् ।येषां पुरुत्रा विजयस्य मह्ननि चतुष्पादो द्विपदो यन्ति यामम्
सिर में सात छिद्र किसने खोदे — ये दो कान, दो नथुने, दो आँखें और मुँह? इन्हीं की विजय-महिमा से चौपाए और दुपाए अनेक दिशाओं में अपनी राह चलते हैं।
Who bored the seven openings in the head: these two ears, the nostrils, the eyes, the mouth, by the greatness of whose victory four-footed and two-footed creatures go their way in many places?
- ७
हन्वोर् हि जिह्वाम् अदधात् पुरूचीम् अधा महीम् अधि शिश्राय वाचम् ।स आ वरीवर्ति भुवनेष्व् अन्तर् अपो वसानः क उ तच् चिकेत
उसने जबड़ों में दूर तक पहुँचने वाली जीभ रखी और उस पर महती वाणी को टिकाया। वही जल ओढ़े हुए लोकों के भीतर बार-बार घूमता रहता है — यह कौन जानता है?
He placed the far-reaching tongue in the jaws, then set great Speech upon it. Clothed in the waters, he moves about within the worlds. Who has understood that?
- ८
मस्तिष्कम् अस्य यतमो ललातं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम् ।चित्वा चित्यं हन्वोः पूरुषस्य दिवं रुरोह कतमः स देवः
उसका मस्तिष्क, माथा, सिर का पिछला भाग और खोपड़ी सबसे पहले किसने बनाई? मनुष्य के जबड़ों की चिति चिनकर जो स्वर्ग चढ़ गया, वह कौन-सा देव था?
Which one first made his brain, his forehead, the back of his head, his skull, and, having built up the structure of the man's jaws, climbed to heaven? Which god is that?
- ९
प्रियाप्रियाणि बहुला स्वप्नं संबाधतन्द्यः᳙ ।आनन्दान् उग्रो नन्दांश् च कस्माद् वहति पूरुषः
बहुत-से प्रिय और अप्रिय अनुभव, नींद, कष्ट और थकान, तथा आनंद और हर्ष — यह बलवान मनुष्य इन सबको किसके कारण ढोता है?
The many pleasant and unpleasant things, sleep, afflictions and weariness, joys and delights: where does mighty man get these that he carries?
- १०
आर्तिर् अवर्तिर् निरृतिः कुतो नु पुरुषे ऽमतिः ।राद्धिः समृद्धिर् अव्यृद्धिर् मतिर् उदितयः कुतः ॥१०॥ {४}
मनुष्य में पीड़ा, अभाव, विनाश और मूढ़ता कहाँ से आते हैं? और सफलता, समृद्धि, अक्षय-भाव, बुद्धि तथा उन्नति कहाँ से?
Distress, want, Nirriti, and lack of sense: where do these come from in a man? Success, prosperity, freedom from failure, understanding and rising fortunes: where do these come from?
- ११
को अस्मिन्न् आपो व्य् अ᳙दधात् विषूव्ŕ̥तः पुरूव्ŕ̥तः सिन्धुस्ŕ̥त्याय जाताः ।तीव्रा अरुणा लोहिनीस् ताम्रधूम्रा ऊर्ध्वा अवाचीः पुरुषे तिरश्चीः
किसने उसमें जलों को बाँटा, जो चारों ओर मुड़ने वाले और अनेक फेरे लेने वाले हैं तथा नदियों की तरह बहने के लिए बने हैं — तीखे, अरुण, लाल, ताम्र-धूम्र वर्ण के, मनुष्य में ऊपर, नीचे और आड़े बहते हुए?
Who placed the waters in him, spreading everywhere, turning many ways, born to flow like rivers: sharp, ruddy, red, copper-dusky, running up, down and across in a man?
- १२
को अस्मिन् रूपम् अदधात् को मह्मानं च नाम च ।गातुं को अस्मिन् कः केतुं कश् चरित्रानि पुरुषे
किसने उसमें रूप रखा, किसने महिमा और नाम? किसने गति, किसने चेतना का चिह्न और किसने मनुष्य में चाल-ढाल की क्रियाएँ रखीं?
Who placed form in him, who greatness and name? Who gave him movement, who understanding, who his ways of acting?
- १३
को अस्मिन् प्राणं अवयत् को अपानं व्यानम् उ ।समानम् अस्मिन् को देवो ऽधि शिश्राय पुरुषे
किसने इस मनुष्य में प्राण बुना, किसने अपान और व्यान? और किस देव ने इसमें समान को टिकाया?
Who wove the in-breath into him, who the out-breath and the diffused breath? Which god set the equalising breath in this man?
- १४
को अस्मिन् यज्ञम् अदधाद् एको देवो ऽधि पुरुषे ।को अस्मिन्त् सत्यं को ऽनृतं कुतो मृत्युः कुतो ऽम्ŕ̥तम्
किस एक देव ने इस मनुष्य में यज्ञ रखा? किसने इसमें सत्य रखा और किसने असत्य? मृत्यु कहाँ से आई, अमरता कहाँ से?
Which one god placed the yajna in man? Who put truth in him, who falsehood? Where does death come from, and where immortality?
- १५
को अस्मै वासः पर्य् अदधात् को अस्यायुर् अकल्पयत् ।बलं को अस्मै प्रायछत् को अस्याकल्पयज् जवम्
किसने इसे वस्त्र पहनाया, किसने इसकी आयु नियत की? किसने इसे बल दिया और किसने इसकी फुर्ती निश्चित की?
Who wrapped clothing around him, who fixed his span of life? Who gave him strength, who fixed his speed?
- १६
केनापो अन्व् अतनुत केनाहर् अकरोद् रुचे ।उषसं केनान्व् ऐन्द्ध केन सायंभवं ददे
उसने किसके द्वारा जलों को फैलाया, किससे चमकने के लिए दिन बनाया? किससे उषस् को प्रज्वलित किया और किससे सायंकाल को धारण किया?
By what did he spread out the waters, by what make the day to shine? By what did he kindle Ushas, by what grant the evening?
- १७
को अस्मिन् रेतो न्य् अ᳙दधात् तन्तुर् आ तायताम् इति ।मेधां को अस्मिन्न् अध्य् औहत् को बाणं को न्ŕ̥तो दधौ
किसने उसमें वीर्य रखा, यह कहकर कि 'संतति का तंतु आगे फैले'? किसने उसमें मेधा रखी, किसने वाद्य-ध्वनि और किसने नृत्य?
Who placed seed in him, so that the thread of descent would be spun on? Who brought wisdom into him, who gave him voice, who dancing?
- १८
केनेमां भूमिम् और्णोत् केन पर्य् अभवद् दिवम् ।केनाभि मह्ना पर्वतान् केन कर्माणि पुरुषः
उसने किससे इस पृथ्वी को ढका, किससे द्युलोक को घेरा? किस महिमा से पर्वतों को लाँघा, और किससे मनुष्य अपने कर्म करता है?
By what did he cover this earth, by what surround the sky? By what greatness did he surpass the mountains, by what does man do his work?
- १९
केन पर्जन्यम् अन्व् एति केन सोमं विचक्षणम् ।केन यज्ञम् च श्रद्धां च केनास्मिन् निहितं मनः
वह किससे पर्जन्य तक पहुँचता है, किससे दूरदर्शी सोम तक? किससे यज्ञ और श्रद्धा तक, और किससे उसमें मन रखा गया है?
By what does he follow Parjanya, by what far-seeing Soma? By what yajna and faith? By what is the mind set in him?
- २०
केन श्रोत्रियम् आप्नोति केनेमं परमेष्ठिनम् ।केनेमम् अग्निं पूरुषः केन संवत्सरं ममे ॥२०॥ {५}
मनुष्य किससे श्रोत्रिय को प्राप्त करता है, किससे इस परमेष्ठी को? किससे इस अग्नि को, और किससे उसने संवत्सर को नापा?
By what does man reach the shrotriya, by what this Parameshthin, by what this Agni? By what did he measure the year?
- २१
ब्रह्म श्रोत्रियम् आप्नोति ब्रह्मेमं परमेष्ठिनम् ।ब्रह्मेमम् अग्निं पूरुषो ब्रह्म संवत्सरं ममे
ब्रह्म से वह श्रोत्रिय को प्राप्त करता है, ब्रह्म से इस परमेष्ठी को; ब्रह्म से ही मनुष्य ने इस अग्नि को पाया और ब्रह्म से ही संवत्सर को नापा।
Through brahman man reaches the shrotriya, through brahman this Parameshthin, through brahman this Agni; brahman measured the year.
- २२
केन देवाꣳ अनु क्षियति केन दैवजनीर् विशः ।केनेदम् अन्यन् नक्षत्रं केन सत् क्षत्रम् उच्यते
वह किससे देवों के साथ निवास करता है, किससे दैवी जनों की प्रजाएँ (बसती हैं)? किससे यह दूसरा नक्षत्र-लोक है, और किससे सच्चा क्षत्र कहलाता है?
By what does he dwell among the gods, by what among the divine peoples? By what is this other called nakshatra, by what is the real called kshatra?
- २३
ब्रह्म देवाꣳ अनु क्षियति ब्रह्म दैवजनीर् विशः ।ब्रह्मेदम् अन्यन् नक्षत्रं ब्रह्म सत् क्षत्रम् उच्यते
ब्रह्म से ही वह देवों के साथ निवास करता है, ब्रह्म से दैवी जनों की प्रजाएँ; ब्रह्म ही यह दूसरा नक्षत्र-लोक है और ब्रह्म से ही सच्चा क्षत्र कहलाता है।
Through brahman he dwells among the gods, through brahman among the divine peoples. Through brahman is this other the nakshatra; brahman is called the real kshatra.
- २४
केनेयं भूमिर् विहिता केन द्यौर् उत्तरा हिता ।केनेदम् ऊर्ध्वं तिर्यक् चान्तरिक्षम् व्यचो हितम्
यह पृथ्वी किससे रची गई, द्युलोक किससे ऊपर टिकाया गया? और किससे ऊपर तथा आड़े फैला हुआ अन्तरिक्ष का यह विस्तार स्थापित हुआ?
By whom was this earth laid out, by whom the sky set above? By whom was this atmosphere, the expanse reaching up and across, put in place?
- २५
ब्रह्मणा भूमिर् विहिता ब्रह्म द्यौर् उत्तरा हिता ।ब्रह्मेदम् ऊर्ध्वं तिर्यक् चान्तरिक्षं व्यचो हितम्
ब्रह्म से यह पृथ्वी रची गई, ब्रह्म से द्युलोक ऊपर टिकाया गया; ब्रह्म से ही ऊपर और आड़े फैला हुआ अन्तरिक्ष का यह विस्तार स्थापित हुआ।
By brahman the earth was laid out; brahman set the sky above; brahman put in place this atmosphere, the expanse reaching up and across.
- २६
मूर्धानम् अस्य संसीव्याथर्वा ह्ŕ̥दयं च यत् ।मस्तिष्काद् ऊर्ध्वः प्रैरयत् पवमानो ऽधि शीर्षतः
अथर्वा ने इसके सिर को और हृदय को सीकर जोड़ा; फिर पवमान होकर उसने मस्तिष्क से, सिर के ऊपर से, उसे ऊपर की ओर भेजा।
Atharvan, having sewn together his head and his heart, as the purifying one sent it upward from the brain, out over the head.
- २७
तद् वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुब्जितः ।तत् प्राणो अभि रक्षति शिरो अन्नम् अथो मनः
वह अथर्वा का सिर ही देवों का कोश है, जो कसकर बंद किया गया है। उस सिर की, तथा अन्न और मन की, प्राण रक्षा करता है।
That head of Atharvan is a closed-up treasure chest of the gods. Breath guards that head, and so do food and mind.
- २८
ऊर्ध्वो नु सृष्टा३स् तिर्यङ् नु सृष्टा३स् सर्वा दिशः पुरुष आ बभूवा३ꣳ ।पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते
क्या वह ऊपर की ओर रचा गया, या आड़े? पुरुष सब दिशाओं में व्याप्त हो गया — (यह वही जानता है) जो ब्रह्म की उस नगरी को जानता है, जिसके कारण वह पुरुष कहलाता है।
Was he created upward? Was he created across? Did man come to fill all the directions? He, the one who knows the stronghold of brahman, after which man is called purusha.
- २९
यो वै तां ब्रह्मणो वेदाम्ŕ̥तेनावृतां पुरम् ।तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश् च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः
जो ब्रह्म की उस नगरी को जानता है, जो अमृत से ढकी हुई है, उसे ब्रह्म और ब्रह्मज्ञ लोग आँख, प्राण और संतान देते हैं।
Whoever knows that stronghold of brahman, enclosed by immortality, to him brahman and those who belong to brahman have given sight, breath and offspring.
- ३०
न वै तम् चक्षुर् जहाति न प्राणो जरसः पुरा ।पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते
बुढ़ापा आने से पहले न उसकी आँख उसे छोड़ती है, न प्राण — जो ब्रह्म की उस नगरी को जानता है, जिसके कारण वह पुरुष कहलाता है।
Neither sight nor breath leaves him before old age, the one who knows the stronghold of brahman after which man is called purusha.
- ३१
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूर् अयोध्या ।तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः
आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली देवों की वह नगरी अजेय है; उसमें ज्योति से घिरा हुआ स्वर्गीय सुनहरा कोश है।
Eight-wheeled and nine-gated is the stronghold of the gods, unconquerable. In it is a golden chest, heavenly, enclosed in light.
- ३२
तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्य᳙रे त्रिप्रतिष्ठिते ।तस्मिन् यद् यक्षम् आत्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः
तीन अरों वाले और तीन आधारों पर टिके उस सुनहरे कोश में जो आत्मावान् रहस्यमय तत्त्व (यक्ष) है, उसी को ब्रह्म के जानने वाले जानते हैं।
In that golden chest, three-spoked and resting on three supports, is the wondrous being that has a self. That is what the knowers of brahman know.
- ३३
प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा संपरीवृताम् ।पुरं हिरण्ययीं ब्रह्मा विवेशापराजिताम् ॥३३॥ {६}
चमकती हुई, सुनहरी आभा वाली, यश से चारों ओर घिरी और अपराजित उस स्वर्णमयी नगरी में ब्रह्म ने प्रवेश किया।
Brahman entered the radiant, golden-yellow stronghold, wrapped in glory, golden and unconquered.