अथर्ववेदAtharvavedaAV 8.7

रोग-निवारण हेतु ओषधियों का आह्वानCalling on the healing plants

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    या बभ्रवो याश् च शुक्रा रोहिणीर् उत प्ŕ̥श्नयः ।असिक्नीः कृष्णा ओषधीः सर्वा अछावदामसि

    जो भूरी हैं, जो उजली हैं, जो लाल और चितकबरी हैं, जो साँवली और काली हैं — उन सब ओषधियों को हम पुकारते हैं।

    The brown ones and the bright ones, the red and the speckled, the dark and the black plants: we call out to all of them.

  2. २

    त्रायन्ताम् इमं पुरुसं यक्ष्माद् देवेषिताद् अधि ।यासाम् द्यौः पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव

    वे इस पुरुष को देवताओं द्वारा भेजे गए यक्ष्म से बचाएँ — वे ओषधियाँ जिनका पिता द्यौ, माता पृथिवी और मूल समुद्र है।

    May they protect this man from the yakṣma sent by the gods, these plants whose father is Heaven, whose mother is Earth, and whose root is the ocean.

  3. ३

    आपो अग्रं दिव्या ओषधयः ।तास् ते यक्ष्मम् एनस्य᳙म् अङ्गादङ्गाद् अनीनशन्

    (रोगी से:) जल सबसे आगे हैं, और दिव्य ओषधियाँ; उन्होंने तेरे पाप से उपजे यक्ष्म को अंग-अंग से नष्ट कर दिया है।

    (To the patient:) The waters are foremost, and the heavenly plants; they have destroyed your yakṣma, born of sin, from every limb.

  4. ४

    प्रस्तृणती स्तम्बिनीर् एकशुङ्गाः प्रतन्वतीर् ओषधीर् आ वदामि ।अंशुमतीः कण्डिनीर् या विशाखा ह्वयामि ते वीरुधो वैश्वदेवीर् उग्राः पुरुषजीवनीः

    फैलने वाली, गुच्छेदार, एक कोष वाली, बढ़ती जाने वाली ओषधियों को मैं पुकारता हूँ; अंकुरों वाली, गाँठों वाली, शाखाओं वाली — सब देवताओं की, उग्र, मनुष्य को जीवन देने वाली वनस्पतियों को मैं तेरे लिए बुलाता हूँ।

    I call on the spreading, the tufted, the single-sheathed, the outstretching plants; the shooting, the jointed, the branching ones I summon for you — plants of all the gods, mighty, giving life to men.

  5. ५

    यद् वः सहः सहमाना वीर्यं᳙१ यच् च वो बलम् ।तेनेमम् अस्माद् यक्ष्मात् पुरुषं मुञ्चतौषधीर् अथो कृणोमि भेषजम्

    हे प्रबल ओषधियो, तुम्हारी जो विजयी शक्ति, जो वीरता और जो बल है, उससे इस पुरुष को इस यक्ष्म से छुड़ाओ; और मैं औषध तैयार करता हूँ।

    O overpowering plants, with the conquering force, the valour and the strength you have, free this man from this yakṣma; and I prepare the remedy.

  6. ६

    जीवलां नघारिषां जीवन्तीम् ओषधीम् अहम् ।अरुन्धतीम् उन्नयन्तीं पुष्पाम् मधुमतीम् इह हुवे ऽस्मा अरिष्टतातये

    जीवला, नघारिषा, जीवन्ती ओषधि, उठाने वाली अरुन्धती, फूलों वाली और मधुर ओषधि को मैं यहाँ इसकी रक्षा-कुशलता के लिए बुलाता हूँ।

    I call here the plants Jīvalā, Naghāriṣā and Jīvantī, the uplifting Arundhatī, the flowering and honeyed one, for this man's well-being.

  7. ७

    इहा यन्तु प्रचेतसो मेदिनीर् वचसो मम ।यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरिताद् अधि

    समझदार ओषधियाँ, मेरे वचन की सहायक बनकर, यहाँ आएँ, जिससे हम इस पुरुष को संकट से पार ले जाएँ।

    Let the wise plants come here, as allies of my speech, so that we may carry this man across, beyond harm.

  8. ८

    अग्नेर् घासो अपां गर्भो या रोहन्ति पुनर्णवाः ।ध्रुवाः सहस्रनाम्नीर् भेषजीः सन्त्व् आभृताः

    जो अग्नि का चारा और जलों का गर्भ हैं, जो फिर-फिर नई होकर उगती हैं — वे दृढ़, हज़ार नामों वाली ओषधियाँ यहाँ लाई जाकर औषध बनें।

    The fodder of Agni, the embryo of the waters, which grow up renewed again and again — may these firm, thousand-named plants, brought here, be remedies.

  9. ९

    अवकोल्बा उदकात्मान ओषधयः ।व्यृ᳙षन्तु दुरितं तीक्ष्णशृङ्ग्यः᳙

    अवका रूपी झिल्ली वाली, जल-स्वभाव वाली, तीखे सींगों वाली ओषधियाँ संकट को धकेलकर दूर करें।

    Let the plants wrapped in avakā, whose nature is water, the sharp-horned ones, thrust away harm.

  10. १०

    उन्मुञ्चन्तीर् विवरुणा उग्रा या विषदूषनीः ।अथो बलासनाशनीः कृत्यादूषणीश् च यास् ता इहा यन्त्व् ओषधीः ॥१०॥ {१७}

    जो छुड़ाने वाली, वरुण के बन्धन से मुक्त करने वाली, उग्र और विष का नाश करने वाली हैं, और जो बलास को मिटाने वाली और कृत्या को निष्फल करने वाली हैं — वे ओषधियाँ यहाँ आएँ।

    The releasing ones, those that free from Varuna, the fierce ones that spoil poison, and those that destroy balāsa and undo witchcraft — let those plants come here.

  11. ११

    अपक्रीताः सहीयसीर् वीरुधो या अभिष्टुताः ।त्रायन्ताम् अस्मिन् ग्रामे गाम् अश्वं पुरुषं पशुम्

    मोल लेकर प्राप्त की गई, अधिक प्रबल, स्तुति की गई वनस्पतियाँ इस गाँव में गाय, घोड़े, मनुष्य और पशु की रक्षा करें।

    The plants that have been bought, the stronger ones that have been praised — let them protect cow, horse, man and beast in this village.

  12. १२

    मधुमन् मूलं मधुमद् अग्रम् आसाम् मधुमन् मध्यं वीरुधां बभूव ।मधुमत् पर्णं मधुमत् पुष्पम् आसां मधोः सम्भक्ता अम्ŕ̥तस्य भक्षो घृतम् अन्नं दुह्रतां गोपुरोगवम्

    इन वनस्पतियों का मूल मधुर है, सिरा मधुर है, मध्य मधुर है; पत्ता और फूल मधुर हैं। मधु में भागी, अमृत का भोजन ये ओषधियाँ, गायों को आगे रखकर, घी और अन्न दुहें।

    Their root is honeyed, their tip is honeyed, the middle of these plants is honeyed; honeyed their leaf, honeyed their flower. Sharing in honey, food of amṛta, let them yield ghee and food, with the cows in the lead.

  13. १३

    यावतीः कियतीश् चेमाः पृथिव्याम् अध्य् ओषधीः ।ता मा सहस्रपर्ण्यो᳙ मृत्योर् मुञ्चन्त्व् अंहसः

    पृथिवी पर जितनी भी और जैसी भी ये ओषधियाँ हैं, वे हज़ार पत्तों वाली मुझे मृत्यु से और संकट से छुड़ाएँ।

    However many plants there are on the earth, of whatever kind, may those thousand-leaved ones free me from death and from distress.

  14. १४

    वैयाघ्रो मणिर् वीरुधां त्रायमानो ऽभिशस्तिपाः ।अमीवाः सर्वा रक्षांस्य् अप हन्त्व् अधि दूरम् अस्मत्

    वनस्पतियों से बनी बाघ-जैसी मणि, रक्षा करने वाली और शाप से बचाने वाली, सब रोगों और राक्षसों को हमसे दूर मार भगाए।

    The tiger amulet made of plants, protecting and guarding against curses — may it strike all diseases and demons far away from us.

  15. १५

    सिंहस्येव स्तनथोः सं विजन्ते ऽग्नेर् इव विजन्ते आभृताभ्यः ।गवां यक्ष्मः पुरुषाणां वीरुद्भिर् अतिनुत्तो नाव्या᳙ एतु स्रोत्याः

    जैसे सिंह की दहाड़ से, जैसे अग्नि से, वैसे ही (रोग) लाई गई ओषधियों से काँपते हैं। गायों और मनुष्यों का यक्ष्म वनस्पतियों द्वारा धकेला जाकर नाव-योग्य नदियों में चला जाए।

    As at a lion's roar, as before fire, (the diseases) tremble before the plants that have been brought. Let the yakṣma of cows and men, driven off by the plants, go away into the navigable streams.

  16. १६

    मुमुचाना ओषधयो ऽग्नेर् वैश्वानराद् अधि ।भूमिं संतन्वतीर् इत यासां राजा वनस्पतिः

    हे ओषधियो, अग्नि वैश्वानर से छूटकर, धरती पर फैलती हुई जाओ — तुम जिनका राजा वनस्पति (वृक्ष) है।

    O plants, freed from Agni Vaishvanara, go spreading over the earth, you whose king is the forest tree.

  17. १७

    या रोहन्त्य् आङ्गिरसीः पर्वतेषु समेषु च ।ता नः पयस्वतीः शिवा ओषधीः सन्तु शं हृदे

    जो आङ्गिरसी ओषधियाँ पर्वतों पर और समतल भूमि पर उगती हैं, वे रस से भरी, कल्याणकारी ओषधियाँ हमारे हृदय को सुख दें।

    The Angirasa plants that grow on the mountains and on the plains — may those plants, full of sap and kindly, bring comfort to our hearts.

  18. १८

    याश् चाहं वेद वीरुधो याश् च पश्यामि चक्षुषा ।अज्ञाता जानीमश् च या यासु विद्म च संभृतम्

    जिन वनस्पतियों को मैं जानता हूँ और जिन्हें आँख से देखता हूँ, जो अज्ञात हैं और जिन्हें हम जानते हैं, और जिनमें हम (शक्ति) संचित जानते हैं —

    The plants I know and those I see with my eyes, the unknown ones and those we know, and those in which we know (power) is stored —

  19. १९

    सर्वाः समग्रा ओषधीर् बोधन्तु वचसो मम ।यथेमं पारयामसि पुरुषम् दुरिताद् अधि

    सब की सब ओषधियाँ मेरे वचन पर ध्यान दें, जिससे हम इस पुरुष को संकट से पार ले जाएँ।

    Let all the plants together heed my words, so that we may carry this man across, beyond harm.

  20. २०

    अश्वत्थो दर्भो वीरुधां सोमो राजाम्ŕ̥तं हविः ।व्रीहिर् यवश् च भेषजौ दिवसि पुत्राव् अमर्त्यौ ॥२०॥ {१८}

    अश्वत्थ, दर्भ, वनस्पतियों का राजा सोम, अमृत रूपी हवि; व्रीहि (धान) और यव (जौ) — ये दोनों औषध द्युलोक के अमर पुत्र हैं।

    Ashvattha, darbha grass, Soma the king of plants, the immortal oblation; rice and barley are remedies, the two immortal sons of heaven.

  21. २१

    उज् जिहीध्वे स्तनयत्य् अभिक्रन्दत्य् ओषधीः ।यदा वः पृश्निमातरः पर्जन्यो रेतसावति

    हे पृश्नि को माता मानने वाली ओषधियो, जब पर्जन्य गरजता है, तुम्हारी ओर दहाड़ता है और अपने वीर्य (वर्षा) से तुम्हें तृप्त करता है, तब तुम ऊपर उठ आती हो।

    You spring up, O plants whose mother is Prishni, when Parjanya thunders and roars toward you and favours you with his seed.

  22. २२

    तस्याम्ŕ̥तस्येमं बलं पुरुषं पययामसि ।अथो कृणोमि भेषजं यथासच् छतहायनः

    उस अमृत का बल हम इस पुरुष को पिलाते हैं; और मैं औषध बनाता हूँ, जिससे यह सौ वर्ष का हो।

    We make this man drink the strength of that amṛta; and I prepare the remedy so that he may live a hundred years.

  23. २३

    वराहो वेद वीरुधं नकुलो वेद भेषजीम् ।सर्पा गन्धर्वा या विदुस् ता अस्मा अवसे हुवे

    सूअर वनस्पति को जानता है, नेवला औषधि को जानता है; जिन्हें सर्प और गन्धर्व जानते हैं, उन्हें मैं इसकी रक्षा के लिए बुलाता हूँ।

    The boar knows the plant, the mongoose knows the remedy; the ones the serpents and Gandharvas know, I call on for this man's help.

  24. २४

    याः सुपर्णा आङ्गिरसीर् दिव्या या रघतो विदुः ।वयांसि हंसा या विदुर् यास् च सर्वे पतत्रिणः ।मृगा या विदुर् ओषधीस् ता अस्मा अवसे हुवे

    जिन आङ्गिरसी ओषधियों को सुपर्ण (गरुड़-पक्षी) जानते हैं, जिन दिव्य ओषधियों को रघट जानते हैं, जिन्हें पक्षी, हंस और सब उड़ने वाले जानते हैं, जिन्हें वन्य पशु जानते हैं — उन ओषधियों को मैं इसकी रक्षा के लिए बुलाता हूँ।

    The Angirasa plants the eagles know, the heavenly ones the raghaṭs know; those the birds, the swans and all winged creatures know, those the wild beasts know — I call on those plants for this man's help.

  25. २५

    यावतीनाम् ओषधीनां गावः प्राश्नन्त्य् अघ्न्या यवतीनाम् अजावयः ।तावतीस् तुभ्यम् ओषधीः शर्म यछन्त्व् आभृताः

    (रोगी से:) जितनी ओषधियाँ अवध्य गायें खाती हैं, जितनी बकरियाँ और भेड़ें खाती हैं, उतनी ओषधियाँ यहाँ लाई जाकर तुझे शरण दें।

    (To the patient:) As many plants as the inviolable cows eat, as many as the goats and sheep eat, may so many plants, brought here, give you shelter.

  26. २६

    यावतीषु मनुष्या᳙ भेषजं भिषजो विदुः ।तावतीर् विश्वभेषजीर् आ भरामि त्वाम् अभि

    जितनी ओषधियों में मनुष्य वैद्य औषध-गुण जानते हैं, उतनी सर्व-रोगहारी ओषधियाँ मैं तेरे पास लाता हूँ।

    As many plants as human physicians know to hold a remedy, so many all-healing plants I bring to you.

  27. २७

    पुष्पवतीः प्रसूमतीः फलिनीर् अफला उत ।संमातर इव दुह्राम् अस्मा अरिष्टतातये

    फूलों वाली, अंकुरों वाली, फलों वाली और बिना फल वाली ओषधियाँ, एक साथ की माताओं की तरह, इसकी कुशलता के लिए दूध दें।

    The flowering, the sprouting, the fruiting and the fruitless plants — like mothers together, let them yield milk for this man's well-being.

  28. २८

    उत् त्वाहार्षं पञ्चशलाद् अथो दशशलाद् उत ।अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात् ॥२८॥ {१९}

    (रोगी से:) मैंने तुझे पाँच-शल और दस-शल वाले (बन्धन) से, यम की बेड़ी से, और देवताओं के प्रति हर अपराध से ऊपर उठा लिया है।

    (To the patient:) I have lifted you out of the five-śala and the ten-śala, out of Yama's fetter, and out of every offence against the gods.