अथर्ववेदAtharvavedaAV 11.4
प्राण की स्तुतिPraise of Prana, the breath of life
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- १
प्राणाय नमो यस्य सर्वम् इदं वशे ।यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त् सर्वं प्रतिष्ठितम्
प्राण को नमस्कार, जिसके वश में यह सब है; जो सबका स्वामी बना है और जिसमें सब कुछ टिका हुआ है।
Homage to Prana, who holds all this in his control, who has become lord of everything, and in whom everything is established.
- २
नमस् ते प्राण क्रन्दाय नमस् ते स्तनयित्नवे ।नमस् ते प्राण विद्युते नमस् ते प्राण वर्षते
हे प्राण, गर्जन रूप तुझे नमस्कार, मेघ की गड़गड़ाहट रूप तुझे नमस्कार; हे प्राण, बिजली रूप तुझे नमस्कार, बरसते हुए तुझे नमस्कार।
Homage to you, Prana, as the roar; homage to you as the thunder. Homage to you, Prana, as the lightning; homage to you, Prana, as you rain.
- ३
यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्य् ओषधीः ।प्र वीयन्ते गर्भान् दधते ऽथो बह्वीर् वि जायन्ते
हे प्राण, जब तू मेघगर्जन से ओषधियों की ओर गरजता है, तब वे गर्भित होती हैं, गर्भ धारण करती हैं और फिर अनेक रूपों में उत्पन्न होती हैं।
When, Prana, you roar at the plants with thunder, they are impregnated and conceive, and then are born in great numbers.
- ४
यत् प्राण ऋताव् आगते ऽभिक्रन्दत्य् ओषधीः ।सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्याम् अधि
हे प्राण, जब ऋतु आने पर तू ओषधियों की ओर गरजता है, तब पृथ्वी पर जो कुछ भी है, सब आनन्दित होता है।
When, Prana, at the coming of the season you roar at the plants, then everything that is on the earth rejoices.
- ५
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम् ।पशवस् तत् प्र मोदन्ते महो वै नो भविष्यति
जब प्राण ने विशाल पृथ्वी पर वर्षा बरसाई, तब पशु आनन्दित होते हैं — 'अब निश्चय ही हमारे लिए बड़ी समृद्धि होगी।'
When Prana has rained his rain on the great earth, the cattle rejoice: 'Now surely there will be plenty for us.'
- ६
अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन सम् अवादिरन् ।आयुर् वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीर् अकः
वर्षा से भीगी ओषधियों ने प्राण से कहा — 'तूने हमारी आयु बढ़ा दी है, तूने हम सबको सुगन्धित कर दिया है।'
The plants, rained upon, spoke with Prana: 'You have lengthened our life; you have made us all fragrant.'
- ७
नमस् ते अस्त्व् आयते नमो अस्तु परायते ।नमस् ते प्राण तिष्ठत आसीनायोत ते नमः
आते हुए तुझे नमस्कार हो, जाते हुए तुझे नमस्कार हो; हे प्राण, खड़े हुए तुझे नमस्कार और बैठे हुए तुझे भी नमस्कार।
Homage to you as you come, homage as you go; homage to you, Prana, standing, and homage to you sitting.
- ८
नमस् ते प्राण प्राणते नमो अस्त्व् अपानते ।पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै त इदं नमः
हे प्राण, साँस लेते हुए तुझे नमस्कार, साँस छोड़ते हुए तुझे नमस्कार; बाहर की ओर मुड़े तुझे नमस्कार, भीतर की ओर मुड़े तुझे नमस्कार; तेरे सम्पूर्ण रूप को यह नमस्कार।
Homage to you, Prana, as you breathe in; homage as you breathe out. Homage to you turned away, homage to you turned toward us; this homage is to the whole of you.
- ९
या ते प्राण प्रिया तनूर् यो ते प्राण प्रेयसी ।अथो यद् भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे
हे प्राण, जो तेरा प्रिय शरीर है और जो उससे भी प्रियतर है, और जो तेरी औषधि है, उसमें से हमें जीने के लिए दे।
Your dear form, Prana, and your dearer one, and whatever healing remedy is yours — give us of that, so that we may live.
- १०
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रम् इव प्रियम् ।प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच् च प्राणति यच् च न ॥१०॥ {११}
प्राण प्राणियों को वैसे ही ढके रहता है जैसे पिता अपने प्रिय पुत्र को। प्राण ही सबका स्वामी है — जो साँस लेता है उसका भी और जो नहीं लेता उसका भी।
Prana clothes living beings as a father does his dear son. Prana is lord of all, of what breathes and of what does not.
- ११
प्राणो मृत्युः प्राणस् तक्मा प्राणं देवा उपासते ।प्राणो ह सत्यवादिनम् उत्तमे लोक आ दधत्
प्राण मृत्यु है, प्राण तक्मन् (ज्वर) है; देवता प्राण की उपासना करते हैं। प्राण सत्य बोलने वाले को उत्तम लोक में स्थापित करता है।
Prana is death, Prana is takman, the fever; the gods worship Prana. Prana sets the speaker of truth in the highest world.
- १२
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते ।प्राणो ह सूर्यश् चन्द्रमाः प्राणम् आहुः प्रजापतिम्
प्राण विराज् है, प्राण निर्देश देने वाली (देष्ट्री) है; सब प्राण की उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य और चन्द्रमा है; प्राण को प्रजापति कहते हैं।
Prana is Viraj, Prana is the directress; all worship Prana. Prana is the sun and the moon; they call Prana Prajapati.
- १३
प्राणापानौ व्रीहियवाव् अनड्वान् प्राण उच्यते ।यवे ह प्राण आहितो ऽपानो व्रीहिर् उच्यते
प्राण और अपान धान और जौ हैं; प्राण को बैल कहा जाता है। जौ में प्राण रखा गया है, और अपान को धान कहा जाता है।
Prana and apana are rice and barley; Prana is called the draught-ox. In barley Prana is placed; apana is called rice.
- १४
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा ।यदा त्वं प्राण जिन्वस्य् अथ स जायते पुनः
गर्भ के भीतर पुरुष साँस छोड़ता और साँस लेता है। हे प्राण, जब तू उसे सजीव करता है, तब वह फिर जन्म लेता है।
Within the womb the person breathes out and breathes in. When you, Prana, quicken him, then he is born again.
- १५
प्राणम् आहुर् मातरिश्वानं वातो ह प्राण उच्यते ।प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्
प्राण को मातरिश्वन् कहते हैं, वायु को प्राण कहा जाता है। प्राण में ही भूत और भविष्य है, प्राण में सब कुछ टिका है।
They call Prana Matarishvan; the wind is called Prana. In Prana is what has been and what will be; in Prana everything is established.
- १६
आथर्वणीर् आङ्गिरसीर् दैवीर् मनुष्यजा उत ।ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि
हे प्राण, जब तू सजीव करता है, तब आथर्वण, आङ्गिरस, दैवी और मनुष्यों द्वारा उपजाई गई ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं।
The plants of the Atharvans and of the Angirases, the divine ones and those produced by men, spring up when you, Prana, quicken them.
- १७
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम् ।ओषधयः प्र जायन्ते ऽथो याः काश् च वीरुधः
जब प्राण ने विशाल पृथ्वी पर वर्षा बरसाई, तब ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, और जो भी लताएँ-पौधे हैं वे भी।
When Prana has rained his rain on the great earth, the plants spring up, and every kind of herb as well.
- १८
यस् ते प्राणेदं वेद यस्मिंश् चासि प्रतिष्ठितः ।सर्वे तस्मै बलिं हरान् अमुष्मिंल् लोक उत्तमे
हे प्राण, जो तेरे विषय में यह जानता है और जिसमें तू प्रतिष्ठित है, उसे सब लोग उस उत्तम लोक में भेंट (बलि) अर्पित करेंगे।
Whoever knows this about you, Prana, and in whom you are established, to him all shall bring tribute in that highest world.
- १९
यथा प्राण बलिह्ŕ̥तस् तुभ्यं सर्वाः प्रजा इमाः ।एवा तस्मै बलिं हरान् यस् त्वा शृणवत् सुश्रवः
हे प्राण, जैसे ये सब प्राणी तुझे भेंट देने वाले हैं, वैसे ही, हे सुकीर्तिमान्, जो तुझे सुनता है, उसे भी वे भेंट अर्पित करेंगे।
Just as all these creatures bring you tribute, Prana, so shall they bring tribute to whoever listens to you, O you of good fame.
- २०
अन्तर् गर्भश् चरति देवतास्व् आभूतो भूतः स उ जायते पुनः ।स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः ॥२०॥ {१२}
गर्भ देवताओं के भीतर विचरता है; वह उत्पन्न होकर, होकर, फिर जन्म लेता है। वह होकर अपनी शक्तियों से वर्तमान और भविष्य में ऐसे प्रविष्ट हुआ, जैसे पिता पुत्र में।
The embryo moves within the deities; having come into being, having been, he is born again. Having been, he entered by his powers into what is and what will be, as a father enters his son.
- २१
एकं पादं नोत् खिदति सलिलाद् धंस उच्चरन् ।यद् अङ्ग स तम् उत्खिदेन् नैवाद्य न श्वः स्यात् ।न रात्री नाहः स्यान् न व्य् उ᳙छेत् कदा चन
जल से ऊपर उठता हुआ हंस एक पैर नहीं निकालता। यदि वह उसे भी निकाल ले, तो न आज रहे न कल, न रात रहे न दिन, और कभी उषा न हो।
The swan, rising out of the waters, does not draw out one foot. If he were to draw it out, there would be no today and no tomorrow, no night and no day; it would never dawn again.
- २२
अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा ।अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यद् अस्यार्धं कतमः स केतुः
आठ पहियों वाला, एक नेमि वाला, सहस्र अक्षरों वाला (रथ) आगे की ओर और पीछे की ओर नीचे घूमता है। आधे से उसने सारे जगत् को उत्पन्न किया; और जो उसका दूसरा आधा है, उसका चिह्न कौन-सा है?
Eight-wheeled, with a single rim, thousand-syllabled, it rolls forward in front and downward behind. With half it brought forth the whole world; what sign is there of its other half?
- २३
यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः ।अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमो ऽस्तु ते
जो इस सर्वजन्मा, चेष्टा करते हुए समस्त जगत् का स्वामी है, औरों के बीच शीघ्र धनुष वाला है — हे प्राण, उस तुझे नमस्कार हो।
You who rule over all this that is born, all that moves, swift with the bow among others — to you, Prana, be homage.
- २४
यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः ।अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरः प्राणो मानु तिष्ठतु
जो इस सर्वजन्मा, चेष्टा करते हुए समस्त जगत् का स्वामी है, वह अथक, ब्रह्म (मन्त्र) से दृढ़ प्राण मेरे साथ बना रहे।
He who rules over all this that is born, all that moves — may that Prana, untiring and steadfast through the sacred word, stand by me.
- २५
ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ् नि पद्यते ।न सुप्तम् अस्य सुप्तेष्व् अनु शुश्राव कश् चन
सोए हुओं के बीच वह सीधा खड़ा जागता रहता है, वह आड़ा होकर नहीं लेटता। सोए हुओं के बीच उसके सोने की बात किसी ने कभी नहीं सुनी।
Upright, he stays awake among those who sleep; he never lies down flat. No one has ever heard of his sleeping among the sleepers.
- २६
प्राण मा मत् पर्यावृतो न मद् अन्यो भविष्यसि ।अपां गर्भम् इव जीवसे प्राण बध्नामि त्वा मयि ॥२६॥ {१३}
हे प्राण, मुझसे मुँह मत मोड़, तू मुझसे अलग नहीं होगा। हे प्राण, जल के गर्भ की भाँति, जीवन के लिए मैं तुझे अपने में बाँधता हूँ।
Prana, do not turn away from me; you will not be other than me. Like the embryo of the waters, Prana, I bind you within me, so that I may live.