अथर्ववेदAtharvavedaAV 11.3
ओदन की महिमाThe cosmic rice-dish (odana)
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- १
तस्यौदनस्य ब्ŕ̥हस्पतिः शिरो ब्रह्म मुखम्
उस ओदन का सिर बृहस्पति है और मुख ब्रह्म है।
Of that rice-dish, Brihaspati is the head and brahman is the mouth.
- २
द्यावापृथिवी श्रोत्रे सूर्याचन्द्रमसाव् अक्षिणी सप्तऋषयः प्राणापानाः
द्यावापृथिवी (आकाश और पृथ्वी) उसके कान हैं, सूर्य और चन्द्रमा आँखें, और सात ऋषि उसके प्राण-अपान हैं।
Heaven and earth are its ears, the sun and moon its eyes, the seven seers its in-breaths and out-breaths.
- ३
चक्षुर् मुसलं काम उलूखलम्
आँख मूसल है, काम (इच्छा) ओखली है।
The eye is the pestle, desire the mortar.
- ४
दितिः शूर्पम् अदितिः शूर्पग्राही वातो ऽपाविनक्
दिति सूप है, अदिति सूप पकड़ने वाली है, और वायु ने (भूसी को) फटककर अलग किया।
Diti is the winnowing basket, Aditi the one who holds it, and the wind sifted out the chaff.
- ५
अश्वाः कणा गावस् तण्डुला मशकास् तुषाः
घोड़े (अन्न के) कण हैं, गायें चावल के दाने हैं, मच्छर भूसी हैं।
Horses are the broken grains, cows the husked rice, gnats the husks.
- ६
कब्रु फलीकरणाः शरो ऽभ्रम्
कब्रु फलीकरण (कूटने से बचा छिलका-चूरा) है, बादल शर है।
The kabru is the phalīkaraṇa (husking refuse), the cloud is the śara.
- ७
श्यामम् अयो ऽस्य मांसानि लोहितम् अस्य लोहितम्
काला धातु (लोहा) उसका मांस है, लाल धातु (ताँबा) उसका रक्त है।
Dark metal (iron) is its flesh, red metal (copper) its blood.
- ८
त्रपु भस्म हरितं वर्णः पुष्करम् अस्य गन्धः
टिन उसकी राख है, सोना उसका रंग है, कमल उसकी गन्ध है।
Tin is its ash, gold its color, the lotus its smell.
- ९
खलः पात्रं स्फ्याव् अंसाव् ईषे अनूक्ये᳙
खलिहान उसका पात्र है, दोनों स्फ्य (लकड़ी की तलवारें) उसके कन्धे हैं, दोनों ईषा (गाड़ी के डण्डे) उसकी रीढ़ हैं।
The threshing floor is its dish, the two wooden swords its shoulders, the two cart-poles its spine.
- १०
आन्त्राणि जत्रवो गुदा वरत्राः
(गाड़ी के) जत्रु उसकी आँतें हैं, और जोतने की रस्सियाँ उसकी अँतड़ियाँ हैं।
Its entrails are the jatru, its intestines the harness straps.
- ११
इयम् एव पृथिवी कुम्भी भवति राध्यमानस्यौदनस्य द्यौर् अपिधानम्
पकाए जा रहे ओदन के लिए यह पृथ्वी ही हाँडी बनती है और द्युलोक उसका ढक्कन।
This very earth becomes the pot for the rice-dish being cooked, and heaven its lid.
- १२
सीताः पर्शवः सिकता ऊबध्यम्
हल की रेखाएँ (कूँड़) उसकी पसलियाँ हैं, बालू उसके पेट का अपचा अंश है।
The furrows are its ribs, the sands the undigested contents of its stomach.
- १३
ऋतं हस्तावनेजनं कुल्यो᳙पसेचनम्
ऋत हाथ धोने का जल है, नहर (उस पर) डालने का रस है।
Rita is the water for washing the hands, the channel is the sauce poured over it.
- १४
ऋचा कुम्भ्य् अधिहितार्त्विज्येन प्रेषिता
ऋचा से हाँडी (आग पर) रखी गई, पुरोहित-कर्म से वह आगे बढ़ाई गई।
By the verse the pot was set on the fire; by the priestly office it was sent forth.
- १५
ब्रह्मणा परिगृहीता साम्ना पर्यूढा
ब्रह्म से वह पकड़ी गई, साम से वह घेरी गई।
It was taken hold of by the brahman and surrounded by the saman.
- १६
बृहद् आयवनं रथन्तरं दर्विः
बृहत् (साम) चलाने की छड़ी है, रथन्तर (साम) करछी है।
The Brihat saman is the stirring stick, the Rathantara the ladle.
- १७
ऋतवः पक्तार आर्तवाः सम् इन्धते
ऋतुएँ पकाने वाली हैं, ऋतुओं के अंश (आर्तव) आग जलाते हैं।
The seasons are the cooks; the season-parts kindle the fire.
- १८
चरुं पञ्चबिलम् उखं घर्मो᳙ ऽभी᳙न्धे ॥१८॥ [नोते चोर्रिगेन्द एद्. श्प्प्]
घर्म (ताप) पाँच छिद्रों वाले चरु-पात्र उखा को तपाता है।
The heat (gharma) fires the five-holed pot, the ukha, for the caru.
- १९
ओदनेन यज्ञवतः सर्वे लोकाः समाप्याः᳙
ओदन के द्वारा यज्ञ करने वाले के सभी लोक प्राप्त किए जा सकते हैं।
Through the rice-dish all the worlds of the sacrificer are to be won.
- २०
यस्मिन्त् समुद्रो द्यौर् भूमिस् त्रयो ऽवरपरं श्रिताः
जिसमें समुद्र, द्युलोक और पृथ्वी — ये तीनों, नीचे-ऊपर, टिके हुए हैं।
In which the ocean, heaven and earth, the three, rest, lower and upper.
- २१
यस्य देवा अकल्पन्तोच्छिष्टे षड् अशीतयः
जिसके उच्छिष्ट (बचे अंश) में देवताओं ने छह अस्सियाँ व्यवस्थित कीं।
In whose leftover the gods arranged six eighties.
- २२
तं त्वौदनस्य पृछामि यो अस्य महिमा महान्
मैं तुमसे ओदन की उस महिमा के विषय में पूछता हूँ जो इसकी महान् महिमा है।
I ask you about the rice-dish: what is its great greatness?
- २३
स य ओदनस्य महिमानं विद्यात्
जो ओदन की महिमा को जानता हो, वह —
Whoever knows the greatness of the rice-dish —
- २४
नाल्प इति ब्रूयान् नानुपसेचन इति नेदं च किं चेति
न कहे कि 'यह थोड़ा है', न कहे कि 'यह बिना रस (सालन) का है', न कहे कि 'यह ऐसा-वैसा कुछ है'।
should not say 'it is little', nor 'it has no sauce', nor 'it is this or that'.
- २५
यावद् दाताभिमनस्येत तन् नाति वदेत्
दाता जितना मन से चाहे, उससे बढ़कर (प्रशंसा में) न बोले।
He should not say more than the giver has in mind.
- २६
ब्रह्मवादिनो वदन्ति पराञ्चम् ओदनं प्राशी३ः प्रत्यञ्चा३म् इति
ब्रह्मवादी कहते हैं: 'क्या तुमने ओदन को परे मुड़ा हुआ खाया, या सम्मुख मुड़ा हुआ?'
The theologians say: 'Did you eat the rice-dish turned away, or turned toward you?'
- २७
त्वम् ओदनं प्राशी३स् त्वाम् ओदना३ इति
'क्या तुमने ओदन को खाया, या ओदन ने तुम्हें?'
'Did you eat the rice-dish, or did the rice-dish eat you?'
- २८
पराञ्चं चैनं प्राशीः प्राणास् त्वा हास्यन्तीत्य् एनम् आह
वह उससे कहता है: 'यदि तुमने इसे परे मुड़ा हुआ खाया, तो प्राण तुम्हें छोड़ देंगे।'
He says to him: 'If you ate it turned away, your in-breaths will leave you.'
- २९
प्रत्यञ्चं चैनं प्राशीर् अपानास् त्वा हास्यन्तीत्य् एनम् आह
वह उससे कहता है: 'यदि तुमने इसे सम्मुख मुड़ा हुआ खाया, तो अपान तुम्हें छोड़ देंगे।'
He says to him: 'If you ate it turned toward you, your out-breaths will leave you.'
- ३०
नैवाहम् ओदनं न माम् ओदनः
'न मैंने ओदन को खाया, न ओदन ने मुझे।'
'I did not eat the rice-dish, nor did the rice-dish eat me.'
- ३१
ओदन एवौदनं प्राशीत् ॥३१॥ {८}
'ओदन ने ही ओदन को खाया।'
'The rice-dish itself ate the rice-dish.'
- ३२
ततश् चैनम् अन्येन शीर्ष्णा प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।ज्येष्ठतस् ते प्रजा मरिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।ब्ŕ̥हस्पतिना शीर्ष्णा ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३२॥ [१]
वह उससे कहता है: 'यदि तुमने इसे उस सिर से भिन्न सिर से खाया जिससे पूर्व ऋषियों ने खाया था, तो तुम्हारी संतान ज्येष्ठ से आरम्भ कर मरेगी।' — 'मैंने इसे न इधर, न परे, न सम्मुख मुड़ा खाया; बृहस्पति रूपी सिर से मैंने इसे खाया और उसी से इसे (लक्ष्य तक) पहुँचाया। यह ओदन सब अंगों, सब जोड़ों, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी सब अंगों, सब जोड़ों, सम्पूर्ण शरीर वाला होता है।'
He says to him: 'If you ate it with a head other than the one the ancient seers ate it with, your offspring will die, beginning with the eldest.' — 'I ate it neither turned hither, nor away, nor toward me; I ate it with Brihaspati as head, and with that I made it reach its goal. This rice-dish is complete in every limb, every joint, its whole body; whoever knows this becomes complete in every limb, every joint, his whole body.'
- ३३
ततश् चैनम् अन्याभ्यां श्रोत्राभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।बधिरो भविष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।द्यावापृथिवीभ्यां श्रोत्राभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३३॥ [२]
'यदि तुमने इसे उन कानों से भिन्न कानों से खाया जिनसे पूर्व ऋषियों ने खाया था, तो तुम बहरे हो जाओगे।' — 'मैंने इसे द्यावापृथिवी रूपी कानों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with ears other than those the ancient seers used, you will become deaf.' — 'I ate it with heaven and earth as ears, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३४
ततश् चैनम् अन्याभ्याम् अक्षीभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।अन्धो भविष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।सूर्याचन्द्रमसाभ्याम् अक्षीभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३४॥ [३]
'यदि तुमने इसे अन्य आँखों से खाया, तो तुम अन्धे हो जाओगे।' — 'मैंने इसे सूर्य और चन्द्रमा रूपी आँखों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other eyes, you will become blind.' — 'I ate it with the sun and moon as eyes, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३५
ततश् चैनम् अन्येन मुखेन प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।मुखतस् ते प्रजा मरिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।ब्रह्मणा मुखेन ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३५॥ [४]
'यदि तुमने इसे अन्य मुख से खाया, तो तुम्हारी संतान मुख से (आरम्भ से) मरेगी।' — 'मैंने इसे ब्रह्म रूपी मुख से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another mouth, your offspring will die from the front (from the first).' — 'I ate it with brahman as mouth, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३६
ततश् चैनम् अन्यया जिह्वया प्राशीर् यया चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।जिह्वा ते मरिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।अग्नेर् जिह्वया ।तयैनं प्राशिषं तयैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३६॥ [५]
'यदि तुमने इसे अन्य जिह्वा से खाया, तो तुम्हारी जिह्वा मर जाएगी।' — 'मैंने इसे अग्नि की जिह्वा से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another tongue, your tongue will die.' — 'I ate it with Agni's tongue, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३७
ततश् चैनम् अन्यैर् दन्तैः प्राशीर् यैश् चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।दन्तास् ते शत्स्यन्तीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।ऋतुभिर् दन्तैः ।तैर् एनं प्राशिषं तैर् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३७॥ [६]
'यदि तुमने इसे अन्य दाँतों से खाया, तो तुम्हारे दाँत गिर जाएँगे।' — 'मैंने इसे ऋतु रूपी दाँतों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other teeth, your teeth will fall out.' — 'I ate it with the seasons as teeth, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३८
ततश् चैनम् अन्यैः प्राणापानैः प्राशीर् यैश् चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।प्राणापानास् त्वा हास्यन्तीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।सप्तऋषिभिः प्राणापानैः ।तैर् एनं प्राशिषं तैर् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३८॥ [७]
'यदि तुमने इसे अन्य प्राण-अपानों से खाया, तो प्राण-अपान तुम्हें छोड़ देंगे।' — 'मैंने इसे सप्तऋषि रूपी प्राण-अपानों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other breaths, your breaths will leave you.' — 'I ate it with the seven seers as breaths, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ३९
ततश् चैनम् अन्येन व्यचसा प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।राजयक्ष्मस् त्वा हनिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।अन्तरिक्षेण व्यचसा ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥३९॥ [८]
'यदि तुमने इसे अन्य विस्तार (शरीर के फैलाव) से खाया, तो राजयक्ष्मा तुम्हें मार डालेगा।' — 'मैंने इसे अन्तरिक्ष रूपी विस्तार से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another expanse, consumption (rajayakshma) will kill you.' — 'I ate it with the midspace as expanse, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४०
ततश् चैनम् अन्येन पृष्ठेन प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।विद्युत् त्वा हनिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।दिवा पृष्ठेन ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४०॥ [९]
'यदि तुमने इसे अन्य पीठ से खाया, तो बिजली तुम्हें मार डालेगी।' — 'मैंने इसे द्युलोक रूपी पीठ से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another back, lightning will kill you.' — 'I ate it with heaven as back, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४१
ततश् चैनम् अन्येनोरसा प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।कृष्या न रात्स्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।पृथिव्योरसा ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४१॥ [१०]
'यदि तुमने इसे अन्य छाती से खाया, तो तुम खेती में सफल नहीं होगे।' — 'मैंने इसे पृथ्वी रूपी छाती से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another breast, you will not prosper in farming.' — 'I ate it with the earth as breast, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४२
ततश् चैनम् अन्येनोदरेण प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।उदरदारस् त्वा हनिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।सत्येनोदरेण ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४२॥ [११]
'यदि तुमने इसे अन्य पेट से खाया, तो उदरदार (पेट फाड़ने वाला रोग) तुम्हें मार डालेगा।' — 'मैंने इसे सत्य रूपी पेट से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another belly, belly-splitting disease will kill you.' — 'I ate it with truth as belly, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४३
ततश् चैनम् अन्येन वस्तिना प्राशीर् येन चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।अप्सु मरिष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।समुद्रेण वस्तिना ।तेनैनं प्राशिषं तेनैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४३॥ [१२]
'यदि तुमने इसे अन्य मूत्राशय से खाया, तो तुम जल में मरोगे।' — 'मैंने इसे समुद्र रूपी मूत्राशय से खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another bladder, you will die in the waters.' — 'I ate it with the ocean as bladder, and with it made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४४
ततश् चैनम् अन्याभ्याम् ऊरुभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।ऊरू ते मरिष्यत इत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।मित्रावरुणयोर् ऊरुभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४४॥ [१३]
'यदि तुमने इसे अन्य जाँघों से खाया, तो तुम्हारी जाँघें मर जाएँगी।' — 'मैंने इसे मित्र और वरुण की जाँघों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other thighs, your thighs will die.' — 'I ate it with the thighs of Mitra and Varuna, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४५
ततश् चैनम् अन्याभ्याम् अष्ठीवद्भ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।स्रामो भविष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।त्वष्टुर् अष्ठीवद्भ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४५॥ [१४]
'यदि तुमने इसे अन्य घुटनों से खाया, तो तुम लँगड़े हो जाओगे।' — 'मैंने इसे त्वष्टा के घुटनों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other knees, you will become lame.' — 'I ate it with Tvashtar's knees, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४६
ततश् चैनम् अन्याभ्यां पादाभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।बहुचारी भविष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।अश्विनोः पादाभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४६॥ [१५]
'यदि तुमने इसे अन्य पैरों से खाया, तो तुम भटकने वाले (बहुचारी) बन जाओगे।' — 'मैंने इसे अश्विनों के पैरों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other feet, you will become a wanderer.' — 'I ate it with the feet of the Ashvins, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४७
ततश् चैनम् अन्याभ्यां प्रपदाभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।सर्पस् त्वा हनिष्यतीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।सवितुः प्रपदाभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४७॥ [१६]
'यदि तुमने इसे अन्य पंजों (पैर के अगले भाग) से खाया, तो साँप तुम्हें मार डालेगा।' — 'मैंने इसे सविता के पंजों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other fore-feet, a snake will kill you.' — 'I ate it with Savitar's fore-feet, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४८
ततश् चैनम् अन्याभ्यां हस्ताभ्यां प्राशीर् याभ्यां चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।ब्राह्मणं हनिष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।ऋतस्य हस्ताभ्याम् ।ताभ्याम् एनं प्राशिषं ताभ्याम् एनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४८॥ [१७]
'यदि तुमने इसे अन्य हाथों से खाया, तो तुम ब्राह्मण की हत्या करोगे।' — 'मैंने इसे ऋत के हाथों से खाया और उन्हीं से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with other hands, you will kill a brahmin.' — 'I ate it with the hands of Rita, and with them made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ४९
ततश् चैनम् अन्यया प्रतिष्ठया प्राशीर् यया चैतं पूर्व ŕ̥षयः प्राश्नन् ।अप्रतिष्ठानो᳙ ऽनायतनो मरिष्यसीत्य् एनम् आह ।तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम् ।सत्ये प्रतिष्ठाय ।तयैनं प्राशिषं तयैनम् अजीगमम् ।एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः ।सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद ॥४९॥ [१८] {९}
'यदि तुमने इसे अन्य आधार से खाया, तो तुम बिना आधार, बिना घर के मरोगे।' — 'मैंने सत्य में दृढ़ होकर इसे खाया और उसी से पहुँचाया। यह ओदन सर्वांग, सर्व-जोड़, सम्पूर्ण शरीर वाला है; जो ऐसा जानता है वह भी वैसा ही होता है।'
'If you ate it with another foundation, you will die without footing and without a home.' — 'Standing firm on truth I ate it, and with that made it reach its goal. This rice-dish is complete in limb, joint and body; whoever knows this becomes so too.'
- ५०
एतद् वै ब्रध्नस्य विष्टपं यद् ओदनः ॥५०॥ [१]
यह जो ओदन है, वही ब्रध्न का शिखर (विष्टप) है।
This rice-dish is the summit of the Ruddy One (Bradhna).
- ५१
ब्रध्नलोको भवति ब्रध्नस्य विष्टपि श्रयते य एवं वेद ॥५१॥ [२]
जो ऐसा जानता है, वह ब्रध्न के लोक का हो जाता है और ब्रध्न के शिखर पर टिकता है।
Whoever knows this comes to belong to Bradhna's world and rests on Bradhna's summit.
- ५२
एतस्माद् वा ओदनात् त्रयस्त्रिंशतं लोकान् निर् अमिमीत प्रजापतिः ॥५२॥ [३]
इसी ओदन से प्रजापति ने तैंतीस लोकों को मापकर बनाया।
From this rice-dish Prajapati measured out the thirty-three worlds.
- ५३
तेषां प्रज्ञानाय यज्ञम् असृजत ॥५३॥ [४]
उन्हें पहचानने के लिए उसने यज्ञ की रचना की।
So that they could be known apart, he created the yajna.
- ५४
स य एवं विदुष उपद्रष्टा भवति प्राणं रुणद्धि ॥५४॥ [५]
जो ऐसा जानने वाले का (निन्दक) दर्शक बनता है, वह (अपना) प्राण रोकता है।
Whoever looks on with ill will at one who knows this blocks his own breath.
- ५५
न च प्राणं रुणद्धि सर्वज्यानिं जीयते ॥५५॥ [६]
वह केवल प्राण ही नहीं रोकता, सर्वनाश भी भोगता है।
He not only blocks his breath; he suffers total ruin.
- ५६
न च सर्वज्यानिं जीयते पुरैनं जरसः प्राणो जहाति ॥५६॥ [७] {१०}
वह केवल सर्वनाश ही नहीं भोगता, बुढ़ापे से पहले ही प्राण उसे छोड़ देता है।
He not only suffers total ruin; his breath leaves him before old age.