अथर्ववेदAtharvavedaAV 10.5

जल द्वारा विजय और शत्रुनाशWaters and Vishnu-steps for victory

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर् वो युनज्मि

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, इन्द्र की प्रबलता, इन्द्र का बल, इन्द्र का पराक्रम और इन्द्र का पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए मैं तुम्हें ब्रह्म के योगों से जोड़ता हूँ।

    (Waters,) you are Indra's force, Indra's might, Indra's strength, Indra's vigour, Indra's manly power. For a victorious yoking I yoke you with the yokings of brahman.

  2. २

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगाय क्षत्रयोगैर् वो युनज्मि

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, प्रबलता, बल, पराक्रम और पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए मैं तुम्हें क्षत्र (राजशक्ति) के योगों से जोड़ता हूँ।

    (Waters,) you are Indra's force, might, strength, vigour and manly power. For a victorious yoking I yoke you with the yokings of kshatra, ruling power.

  3. ३

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगायेन्द्रयोगैर् वो युनज्मि

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, प्रबलता, बल, पराक्रम और पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए मैं तुम्हें इन्द्र के योगों से जोड़ता हूँ।

    (Waters,) you are Indra's force, might, strength, vigour and manly power. For a victorious yoking I yoke you with the yokings of Indra.

  4. ४

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगाय सोमयोगैर् वो युनज्मि

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, प्रबलता, बल, पराक्रम और पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए मैं तुम्हें सोम के योगों से जोड़ता हूँ।

    (Waters,) you are Indra's force, might, strength, vigour and manly power. For a victorious yoking I yoke you with the yokings of Soma.

  5. ५

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगायाप्सुयोगैर् वो युनज्मि

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, प्रबलता, बल, पराक्रम और पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए मैं तुम्हें जलों के योगों से जोड़ता हूँ।

    (Waters,) you are Indra's force, might, strength, vigour and manly power. For a victorious yoking I yoke you with the yokings in the waters.

  6. ६

    इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं᳙ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ ।जिष्णवे योगाय विश्वानि मा भूतान्य् उप तिष्ठन्तु युक्ता म आप स्थ

    (हे जलो,) तुम इन्द्र का ओज, प्रबलता, बल, पराक्रम और पौरुष हो। विजय दिलाने वाले योग के लिए सब प्राणी मेरे पास उपस्थित हों; हे जलो, तुम मुझसे जुड़ गए हो।

    (Waters,) you are Indra's force, might, strength, vigour and manly power. For a victorious yoking let all beings attend on me; you waters are yoked to me.

  7. ७

    अग्नेर् भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम अग्नि का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम (विधान) से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are Agni's share. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  8. ८

    इन्द्रस्य भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम इन्द्र का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are Indra's share. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  9. ९

    सोमस्य भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम सोम का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are Soma's share. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  10. १०

    वरुणस्य भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये ॥१०॥ {१३}

    तुम वरुण का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are Varuna's share. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  11. ११

    मित्रावरुणयोर् भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम मित्र-वरुण का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are the share of Mitra and Varuna. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  12. १२

    यमस्य भाग स्थ अपाम् शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम यम का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are Yama's share. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  13. १३

    पितॄणां भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम पितरों का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are the share of the Fathers. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  14. १४

    देवस्य सवितुर् भाग स्थ अपां शुक्रम् आपो देवीर् वर्चो अस्मासु धत्त ।प्रजापतेर् वो धाम्नास्मै लोकाय सादये

    तुम सविता देव का भाग हो। हे दिव्य जलो, जलों के उज्ज्वल सार, हममें तेज स्थापित करो। प्रजापति के धाम से मैं तुम्हें इस लोक के लिए स्थापित करता हूँ।

    You are the share of the god Savitar. Divine waters, bright essence of the waters, set splendour in us. By the ordinance of Prajapati I set you down for this world.

  15. १५

    यो व आपो ऽपां भागो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ १५ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारा जो भाग है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम उसके विरुद्ध छोड़ते हैं जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं; इस ब्रह्म से, इस कर्म से, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, उसे गिरा दूँ।

    Waters, the share of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, may I strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  16. १६

    यो व आपो ऽपाम् ऊर्मिर् अप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ १६ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारी जो लहर है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the wave of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  17. १७

    यो व आपो ऽपाम् वत्सो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ १७ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारा जो बछड़ा है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the calf of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  18. १८

    यो व आपो ऽपां वृषभो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ॥ इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥ तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ १८ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारा जो वृषभ है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the bull of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  19. १९

    यो व आपो ऽपां हिरण्यगर्भो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ १९ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारा जो हिरण्यगर्भ (सुनहरा गर्भ) है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the golden embryo of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  20. २०

    यो व आपो ऽपां अश्मा प्ŕ̥श्निर् दिव्यो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ २० ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारा जो चितकबरा दिव्य पत्थर है, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उसे मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उसे मैं धो न डालूँ। उससे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the dappled heavenly stone of yours that lies within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash it away. With it we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  21. २१

    यो व आपो ऽपां अग्नयो ऽप्स्व् अ᳙न्तर् यजुष्यो᳙ देवयजनः ।इदं तम् अति सृजामि तं माभ्यवनिक्षि ।तेन तम् अभ्यतिसृजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणानेन कर्मणानया मेन्या ॥ २१ ॥

    हे जलो, जलों के भीतर तुम्हारी जो अग्नियाँ हैं, यजुस् के योग्य और देवयजन का स्थान, उन्हें मैं यहाँ छोड़ता हूँ; उन्हें मैं धो न डालूँ। उनसे हम द्वेषी के विरुद्ध छोड़ते हैं; इस ब्रह्म, इस कर्म, इस मेनि (शाप-अस्त्र) से मैं उसे मारूँ, गिरा दूँ।

    Waters, the fires of yours that lie within the waters, fit for the yajus and a place of worship for the gods, I now release; let me not wash them away. With them we send forth against the one who hates us and whom we hate; may I slay him, strike him down with this brahman, this rite, this meni (curse-weapon).

  22. २२

    यद् अर्वाचीनं त्रैहायणाद् अनृतं किं चोदिम ।आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्व् अंहसः

    पिछले तीन वर्षों के भीतर हमने जो कुछ असत्य बोला है, उस सारे दुष्कर्म और पाप से जल मेरी रक्षा करें।

    Whatever falsehood we have spoken within the last three years, from all that wrongdoing and distress may the waters protect me.

  23. २३

    समुद्रं वः प्र हिणोमि स्वां योनिम् अपीतन ।अरिष्टाः सर्वहायसो मा च नः किं चनाममत्

    (हे जलो,) मैं तुम्हें समुद्र की ओर भेजता हूँ; अपने मूल स्थान में लौट जाओ। तुम पूरी शक्ति के साथ अक्षत रहो, और हमारा कुछ भी रोगग्रस्त न हो।

    (Waters,) I send you off to the ocean; go back into your own home. Unharmed, in full strength, may you go, and may nothing of ours come to harm.

  24. २४

    अरिप्रा आपो अप रिप्रम् अस्मत् ।प्रास्मद् एनो दुरितं सुप्रतीकाः प्र दुष्वप्न्यम् प्र मलं वहन्तु

    निर्मल जल हमसे मैल दूर करें; सुन्दर रूप वाले जल हमसे पाप, दुष्कर्म, बुरे स्वप्न और मलिनता बहा ले जाएँ।

    May the stainless waters carry stain away from us; may the fair-faced ones carry away from us sin, wrongdoing, bad dreams and filth.

  25. २५

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा पृथिवीसंशितो ऽग्नितेजाः ।पृथिवीम् अनु वि क्रमे ऽहं पृथिव्यास् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, पृथ्वी से तीक्ष्ण, अग्नि के तेज वाले। मैं पृथ्वी पर पग बढ़ाता हूँ; जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं, उसे हम पृथ्वी से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the earth, with Agni's brilliance. I stride out over the earth; from the earth we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  26. २६

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहान्तरिक्षसंशितो वायुतेजाः ।अन्तरिक्षम् अनु वि क्रमे ऽहं अन्तरिक्षात् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, अन्तरिक्ष से तीक्ष्ण, वायु के तेज वाले। मैं अन्तरिक्ष में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम अन्तरिक्ष से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the mid-air, with Vayu's brilliance. I stride out through the mid-air; from the mid-air we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  27. २७

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः ।दिवम् अनु वि क्रमे ऽहं दिवस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जिवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, द्युलोक से तीक्ष्ण, सूर्य के तेज वाले। मैं द्युलोक में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम द्युलोक से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by heaven, with Surya's brilliance. I stride out through heaven; from heaven we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  28. २८

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः ।दिशो अनु वि क्रमे ऽहं दिग्भ्यस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, दिशाओं से तीक्ष्ण, मन के तेज वाले। मैं दिशाओं में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम दिशाओं से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the directions, with the brilliance of mind. I stride out through the directions; from the directions we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  29. २९

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः ।आशा अनु वि क्रमे ऽहं आशाभ्यस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, आशाओं (उपदिशाओं) से तीक्ष्ण, वात के तेज वाले। मैं आशाओं में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम आशाओं से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the quarters, with the wind's brilliance. I stride out through the quarters; from the quarters we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  30. ३०

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा ŕ̥क्संशितो सामतेजाः ।ŕ̥चो ऽनु वि क्रमे ऽहं ऋग्भ्यस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु ॥३०॥ {१५}

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, ऋचाओं से तीक्ष्ण, साम के तेज वाले। मैं ऋचाओं के साथ पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम ऋचाओं से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the verses (rc), with the brilliance of the saman. I stride out along the verses; from the verses we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  31. ३१

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा यज्ञसंशितो ब्रह्मतेजाः ।यज्ञम् अनु वि क्रमे ऽहं यज्ञात् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, यज्ञ से तीक्ष्ण, ब्रह्म के तेज वाले। मैं यज्ञ के साथ पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम यज्ञ से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the yajna, with the brilliance of brahman. I stride out along the yajna; from the yajna we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  32. ३२

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहौषधीसंशितो सोमतेजाः ।ओषधीर् अनु वि क्रमे ऽहं ओषधीभ्यस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, औषधियों से तीक्ष्ण, सोम के तेज वाले। मैं औषधियों में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम औषधियों से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the plants, with Soma's brilliance. I stride out among the plants; from the plants we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  33. ३३

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाप्सुसंशितो वरुणतेजाः ।अपो ऽनु वि क्रमे ऽहं अद्भ्यस् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, जलों से तीक्ष्ण, वरुण के तेज वाले। मैं जलों में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम जलों से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by the waters, with Varuna's brilliance. I stride out through the waters; from the waters we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  34. ३४

    विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा कृषिसंशितो ऽन्नतेजाः ।कृषिम् अनु वि क्रमे ऽहं कृष्यास् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, खेती से तीक्ष्ण, अन्न के तेज वाले। मैं खेती में पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम खेती से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by tillage, with the brilliance of food. I stride out over the tilled land; from tillage we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  35. ३५

    विस्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा प्राणसंशितः पुरुषतेजाः ।प्राणम् अनु वि क्रमे ऽहं प्राणात् तं निर् भजामो यो᳙ ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ।स मा जीवीत् तं प्रानो जहातु

    तुम विष्णु का पग हो, शत्रुनाशक, प्राण से तीक्ष्ण, पुरुष के तेज वाले। मैं प्राण के साथ पग बढ़ाता हूँ; द्वेषी को हम प्राण से बाहर करते हैं। वह जीवित न रहे, प्राण उसे छोड़ दें।

    You are Vishnu's step, the rival-slayer, sharpened by breath, with the brilliance of man. I stride out along breath; from breath we shut out the one who hates us and whom we hate. Let him not live; let breath leave him.

  36. ३६

    जितम् अस्माकम् उद्भिन्नम् अस्माकम् अभ्य् अ᳙ष्ठां विश्वाः प्ŕ̥तना अरातीः ।इदम् अहम् आमुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य वर्चस् तेजः प्राणम् आयुर् नि वेष्टयामीदम् एनम् अधराञ्चं पादयामि

    जीता हुआ हमारा है, जो उभर कर निकला वह हमारा है; मैंने सब सेनाओं और शत्रुओं को पराजित कर दिया है। अब मैं अमुक गोत्र वाले, अमुक स्त्री के पुत्र का तेज, ओज, प्राण और आयु लपेट लेता हूँ; अब मैं इसे नीचे गिराता हूँ।

    What is won is ours, what has sprung up is ours; I have overcome all armies and all foes. Now I wrap up the splendour, brilliance, breath and life of so-and-so, descendant of so-and-so, son of such-a-woman; now I throw him down.

  37. ३७

    सूर्यस्याव्ŕ̥तम् अन्वावर्ते दक्षिणाम् अन्व् आव्ŕ̥तम् ।सा मे द्रविणं यछतु सा मे ब्राह्मणवर्चसम्

    मैं सूर्य के घूमने के क्रम में, दक्षिणावर्त घूमता हूँ। वह (आवृत्ति) मुझे धन दे, वह मुझे ब्राह्मण-तेज दे।

    I turn along the sun's course, following the right-hand (southward) turn. May it give me wealth; may it give me a brahmin's splendour.

  38. ३८

    दिशो ज्योतिष्मतीर् अभ्यावर्ते ।ता मे द्रविणं यछन्तु ता मे ब्राह्मणवर्चसम्

    मैं प्रकाशमान दिशाओं की ओर मुड़ता हूँ। वे मुझे धन दें, वे मुझे ब्राह्मण-तेज दें।

    I turn toward the shining directions. May they give me wealth; may they give me a brahmin's splendour.

  39. ३९

    सप्तऋषीन् अभ्यावर्ते ।ते मे द्रविणं यछन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्

    मैं सप्तर्षियों की ओर मुड़ता हूँ। वे मुझे धन दें, वे मुझे ब्राह्मण-तेज दें।

    I turn toward the Seven Rishis. May they give me wealth; may they give me a brahmin's splendour.

  40. ४०

    ब्रह्माभ्यावर्ते ।तन् मे द्रविणं यछन्तु तन् मे ब्राह्मणवर्चसम् ॥४०॥ {१६}

    मैं ब्रह्म की ओर मुड़ता हूँ। वह मुझे धन दे, वह मुझे ब्राह्मण-तेज दे।

    I turn toward brahman. May it give me wealth; may it give me a brahmin's splendour.

  41. ४१

    ब्राह्मणाꣳ अभ्यावर्ते ।ते मे द्रविणं यछन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्

    मैं ब्राह्मणों की ओर मुड़ता हूँ। वे मुझे धन दें, वे मुझे ब्राह्मण-तेज दें।

    I turn toward the brahmins. May they give me wealth; may they give me a brahmin's splendour.

  42. ४२

    यम् वयं मृगयामहे तं वधै स्तृणवामहै ।व्यात्ते परमेष्ठिनो ब्रह्मणापीपदाम तम्

    जिसे (शत्रु को) हम खोज रहे हैं, उसे हम घातक शस्त्रों से गिरा दें। ब्रह्म के द्वारा हमने उसे परमेष्ठी के खुले मुँह में डाल दिया है।

    The one (the foe) we are hunting, let us lay him low with deadly weapons. By brahman we have cast him into the open mouth of Parameshthin.

  43. ४३

    वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस् तं सम् अधाद् अभि ।इयं तं प्सात्व् आहुतिः समिद् देवी सहीयसी

    शस्त्र ने उसे वैश्वानर के दोनों दाँतों के बीच रख दिया है। यह आहुति, यह अधिक प्रबल दिव्य समिधा, उसे निगल जाए।

    The missile has set him between the two tusks of Vaishvanara. Let this oblation devour him, this divine and mightier kindling-stick.

  44. ४४

    राज्ञो वरुणस्य बन्धो ऽसि ।सो ऽमुम् आमुष्यायणम् अमुष्याः पुत्रम् अन्ने प्राणे बधान

    तुम राजा वरुण का बन्धन हो। तुम अमुक गोत्र वाले, अमुक स्त्री के पुत्र को उसके अन्न और प्राण में बाँध दो।

    You are the fetter of King Varuna. Bind so-and-so, descendant of so-and-so, son of such-a-woman, in his food and in his breath.

  45. ४५

    यत् ते अन्नं भुवस् पत आक्षियति पृथिवीम् अनु ।तस्य नस् त्वं भुवस् पते संप्रयछ प्रजापते

    हे भुवनपति, तुम्हारा जो अन्न पृथ्वी पर बसा है, हे भुवनपति प्रजापति, उसमें से हमें दो।

    Lord of being, whatever food of yours dwells upon the earth, of that, lord of being, Prajapati, give us our share.

  46. ४६

    अपो दिव्या अचायिषं रसेन सम् अपृक्ष्महि ।पयस्वान् अग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा

    मैंने दिव्य जलों का आदर किया है; हम उनके रस से मिल गए हैं। हे अग्नि, मैं दूध से भरपूर होकर आया हूँ; मुझे तेज से युक्त करो।

    I have honoured the heavenly waters; we have mingled with their sap. Rich in milk I have come, Agni; unite me with splendour.

  47. ४७

    सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया सम् आयुषा ।विद्युर् मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ŕ̥षिभिः

    हे अग्नि, मुझे तेज से, संतान से और आयु से युक्त करो। देवता मेरी इस बात को जानें; इन्द्र ऋषियों के साथ इसे जाने।

    Agni, unite me with splendour, with offspring, with long life. Let the gods know this of mine; let Indra know it together with the rishis.

  48. ४८

    यद् अग्ने अद्य मिथुना शपतो यद् वाचस् तृष्टं जनयन्त रेभाः ।मन्योर् मनसः शरव्या᳙ जायते या तया विध्य ह्ŕ̥दये यातुधानान्

    हे अग्नि, आज जो दम्पति शाप देते हैं, जो कठोर वचन गायकों ने उत्पन्न किया है, और क्रोधी मन से जो बाणों की बौछार पैदा होती है—उससे यातुधानों (राक्षसी जादूगरों) का हृदय बेध दो।

    Agni, the curse that a couple utter today, the harsh speech that the chanters have produced, the volley of arrows born from the fury of the mind—with that pierce the yatudhanas (sorcerer-demons) in the heart.

  49. ४९

    परा शृणीहि तपसा यातुधानान् पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि ।परार्चिषा मूरदेवां छृणीहि परासुत्ŕ̥पः शोशुचतः शृणीहि

    हे अग्नि, अपने ताप से यातुधानों (राक्षसी जादूगरों) को कुचल दो, अपने क्रोध से राक्षस को कुचल दो; अपनी ज्वाला से मूरदेवों (मिथ्या देवों वाले राक्षसों) को कुचल दो, प्राण चूसने वालों को धधकते हुए कुचल दो।

    Agni, crush the yatudhanas (sorcerer-demons) with your heat, crush the demon with your fury; crush the muradevas (demons with false gods) with your flame, crush, blazing, those who feed on life.

  50. ५०

    अपाम् अस्मै वज्रं प्र हरामि चतुर्भृष्टिं शीर्षभिद्याय विद्वान् ।सो अस्याङ्गानि प्र शृणातु सर्वा तन् मे देवा अनु जानन्तु विश्वे ॥५०॥ {१७}

    जानते हुए मैं इस (शत्रु) पर जलों का चार नोकों वाला वज्र फेंकता हूँ, इसका सिर फोड़ने के लिए। वह इसके सारे अंग चूर कर दे; सब देवता मेरे इस कार्य का अनुमोदन करें।

    Knowingly I hurl at him (the foe) the four-pointed vajra of the waters, to split his head. Let it shatter all his limbs; may all the gods approve this act of mine.