अथर्ववेदAtharvavedaAV 12.5
ब्रह्मगवी हरण का दण्डThe curse on stealing the Brahman's cow
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- ५३
श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्ता र्ते श्रिता वैश्वदेवी ह्य् उ᳙च्यसे कृत्या कूल्बजम् आवृता
श्रम और तप से रची गई, ब्रह्म से प्राप्त, ऋत पर टिकी — तू वैश्वदेवी (सब देवों की) कहलाती है, कूल्बज से ढकी कृत्या।
Created by toil and tapas, found by brahman, resting on rta: you are called (the cow) of all the gods, a krtya wrapped in kulbaja.
- २
सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता
वह सत्य से ढकी है, श्री से आच्छादित है और यश से घिरी है।
She is covered with truth, wrapped in splendour, surrounded by glory.
- ३
स्वधया परिहिता श्रद्धया पर्यूढा दीक्षया गुप्ता यज्ञे प्रतिष्ठिता लोको निधनम्
वह स्वधा से लिपटी है, श्रद्धा से घिरी है, दीक्षा से रक्षित है और यज्ञ में प्रतिष्ठित है; लोक उसका निधन (आश्रय-स्थान) है।
She is clothed in svadha, borne round by faith, guarded by consecration, set firm in the sacrifice; the world is her resting place.
- ४
ब्रह्म पदवायं ब्राह्मणो ऽधिपतिः
ब्रह्म उसका मार्गदर्शक है, ब्राह्मण उसका स्वामी है।
Brahman (sacred speech) is her guide; the Brahman (priest) is her lord.
- ५
ताम् आददानस्य ब्रह्मगवीं जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य
जो क्षत्रिय उस ब्रह्मगवी को छीनता है और ब्राह्मण को सताता है, उससे —
From the Kshatriya who takes that Brahman's cow and oppresses the Brahman —
- ६
अप क्रामति सून्ŕ̥ता वीर्यं᳙ पुन्या लक्ष्मीः ॥६॥ {२४}
— सूनृता (शुभ वाणी), वीर्य और पुण्य लक्ष्मी दूर चली जाती हैं।
— kindly speech, valour and auspicious fortune depart.
- ७
ओजश् च तेजश् च सहश् च बलं च वाक् चेन्द्रियं च श्रीश् च धर्मश् च
ओज, तेज, सहस् (जीतने वाली शक्ति), बल, वाणी, इन्द्रिय-शक्ति, श्री और धर्म —
Vigour and brilliance, might and strength, speech and sense-power, prosperity and dharma —
- ८
ब्रह्म च क्षत्रं च राष्ट्रं च विशश् च त्विषिश् च यशश् च वर्चश् च द्रविणं च
ब्रह्म, क्षत्र, राष्ट्र, प्रजा, कान्ति, यश, वर्चस् और धन —
brahman and kshatra, kingdom and people, radiance and glory, lustre and wealth —
- ९
आयुश् च रूपं च नाम च कीर्तिश् च प्राणश् चापानश् च चक्षुश् च श्रोत्रं च
आयु, रूप, नाम, कीर्ति, प्राण, अपान, आँख और कान —
lifespan and form, name and fame, in-breath and out-breath, sight and hearing —
- १०
पयश् च रसश् चान्नं चान्नाद्यं च र्तं च सत्यं चेष्टं च पूर्तं च प्रजा च पशवश् च
दूध, रस, अन्न, अन्न का भोग, ऋत, सत्य, इष्ट (यज्ञ), पूर्त (दान-कर्म), सन्तान और पशु —
milk and sap, food and the eating of food, rta and truth, sacrifice and pious gifts, offspring and cattle —
- ११
तानि सर्वाण्य् अप क्रामन्ति ब्रह्मगवीम् आददानस्य जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य ॥११॥ {२५}
ये सब उस क्षत्रिय से दूर चले जाते हैं जो ब्रह्मगवी को छीनता है और ब्राह्मण को सताता है।
all these depart from the Kshatriya who takes the Brahman's cow and oppresses the Brahman.
- १२
सैषा भीमा ब्रह्मगव्य् अ᳙घविषा साक्षात् कृत्या कूल्बजम् आवृता
यह ब्रह्मगवी भयंकर है, घोर विष वाली, कूल्बज से ढकी साक्षात् कृत्या।
This Brahman's cow is terrible, full of deadly poison, a witchcraft made visible, wrapped in kulbaja.
- १३
सर्वाण्य् अस्यां घोराणि सर्वे च मृत्यवः
उसमें सब भयानक बातें हैं और सब मृत्युएँ।
In her are all horrors and all deaths.
- १४
सर्वाण्य् अस्यां क्रूराणि सर्वे पुरुषवधाः
उसमें सब क्रूर बातें हैं और सब नर-हत्याएँ।
In her are all cruelties and all killings of men.
- १५
सा ब्रह्मज्यं देवपीयुं ब्रह्मगव्य् आ᳙दीयमाना मृत्योः पद्वीष आ द्यति
छीनी जाती हुई वह ब्रह्मगवी ब्राह्मण को सताने वाले, देवों के निन्दक को मृत्यु की बेड़ी में बाँध देती है।
As she is taken, the Brahman's cow binds the Brahman's oppressor, the scorner of the gods, in the fetter of death.
- १६
मेनिः शतवधा हि सा ब्रह्मज्यस्य क्षितिर् हि सा
वह सौ को मारने वाला शस्त्र (मेनि) है; वह ब्राह्मण-पीड़क का विनाश है।
For she is a weapon that kills a hundred; she is the ruin of the Brahman's oppressor.
- १७
तस्माद् वै ब्राह्मणानां गौर् दुराधर्षा विजानता
इसलिए जो जानता है, उसे ब्राह्मणों की गाय पर हाथ नहीं डालना चाहिए।
Therefore one who knows must not assault the Brahmans' cow.
- १८
वज्रो धावन्ती वैश्वानर उद्वीता
दौड़ती हुई वह वज्र है, हाँककर ले जाई जाती हुई वैश्वानर।
Running, she is a thunderbolt; driven off, she is Vaishvanara.
- १९
हेतिः शफान् उत्खिदन्ती महादेवो᳙ ऽपेक्षमाणा
खुरों से धरती खोदती हुई वह शस्त्र है, इधर-उधर देखती हुई महादेव।
Pawing with her hooves, she is a missile; looking around, she is Mahadeva.
- २०
क्षुरपविर् ईक्षमाणा वाश्यमानाभि स्फूर्जति
देखती हुई वह छुरे की धार है, रँभाती हुई वह गरजती है।
Gazing, she is a razor's edge; bellowing, she thunders.
- २१
मृत्युर् हिङ्कृण्वत्य् उ᳙ग्रो देवः पुछं पर्यस्यन्ती
हिंकार करती हुई वह मृत्यु है, पूँछ फटकारती हुई उग्र देव।
Lowing, she is death; lashing her tail, she is the fierce god.
- २२
सर्वज्यानिः कर्णौ वरीवर्जयन्ती राजयक्ष्मो मेहन्ती
कान हिलाती हुई वह सर्वनाश है, मूत्र करती हुई राजयक्ष्मा।
Twitching her ears, she is total ruin; urinating, she is consumption.
- २३
मेनिर् दुह्यमाना शीर्षक्तिर् दुग्धा
दुही जाती हुई वह शस्त्र (मेनि) है, दुही जा चुकने पर सिरदर्द।
Being milked, she is a weapon; milked, she is headache.
- २४
सेदिर् उपतिष्ठन्ती मिथोयोधः परामृष्टा
पास आकर खड़ी होती हुई वह थकान (सेदि) है, छुई जाने पर आपसी लड़ाई।
Coming near, she is exhaustion; handled, she is fighting among one another.
- २५
शरव्या᳙ मुखे ऽपिनह्यमान ŕ̥तिर् हन्यमाना
मुँह बाँधे जाते समय वह बाणों की बौछार है, मारी जाती हुई वह आघात (ऋति)।
When her mouth is being tied, she is a hail of arrows; being slain, she is assault.
- २६
अघविषा निपतन्ती तमो निपतिता
गिरती हुई वह घोर विष है, गिर चुकने पर अन्धकार।
Falling, she is deadly poison; fallen, she is darkness.
- २७
अनुगछन्ती प्राणान् उप दासयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य ॥२७॥ {२६}
पीछा करती हुई ब्रह्मगवी ब्राह्मण-पीड़क के प्राणों को क्षीण कर देती है।
Following after him, the Brahman's cow wastes away the breaths of the Brahman's oppressor.
- २८
वैरं विकृत्यमाना पौत्राद्यं विभाज्यमाना
काटी जाती हुई वह वैर है, बाँटी जाती हुई पोतों का भक्षण।
Being cut up, she is enmity; being divided, she is the devouring of grandsons.
- २९
देवहेतिर् ह्रियमाणा व्यृ᳙द्धिर् हृता
ले जाई जाती हुई वह देवों का शस्त्र है, ले जाई जा चुकने पर विफलता।
Being carried off, she is the gods' missile; carried off, she is failure.
- ३०
पाप्माधिधीयमाना पारुष्यम् अवधीयमाना
(आग पर) चढ़ाई जाती हुई वह पाप है, उतारी जाती हुई कठोरता।
Being set on the fire, she is evil; being taken down, she is harshness.
- ३१
विषं प्रयस्यन्ती तक्मा प्रयस्ता
उबाली जाती हुई वह विष है, उबल चुकने पर तक्मा (ज्वर)।
Being boiled, she is poison; boiled, she is takman, fever.
- ३२
अघं प्रच्यमाना दुष्वप्न्यं पक्वा
पकाई जाती हुई वह पाप है, पक चुकने पर दुःस्वप्न।
Being cooked, she is evil; cooked, she is bad dreams.
- ३३
मूलबर्हणी पर्याक्रियमाणा क्षितिः पर्याकृता
उलट-पलट की जाती हुई वह जड़ उखाड़ने वाली है, उलटी जा चुकने पर विनाश।
Being turned over, she is the uprooter; turned over, she is destruction.
- ३४
असंज्ञा गन्धेन शुग् उद्ध्रियमाणाशीविष उद्धृता
अपनी गन्ध से वह बेहोशी है; (पात्र से) निकाली जाती हुई शोक, निकाली जा चुकने पर विषैला सर्प।
By her smell she is stupor; being dished out, she is grief; dished out, she is a venomous snake.
- ३५
अभूतिर् उपह्रियमाणा पराभूतिर् उपहृता
परोसी जाती हुई वह अभाव है, परोसी जा चुकने पर पराभव।
Being served, she is want; served, she is defeat.
- ३६
शर्वः क्रुद्धः पिश्यमाना शिमिदा पिशिता
टुकड़े किए जाते समय वह क्रुद्ध शर्व है, कटी हुई शिमिदा।
Being carved, she is angry Sharva; carved, she is Shimida.
- ३७
अवर्तिर् अश्यमाना निरृतिर् अशिता
खाई जाती हुई वह दरिद्रता है, खाई जा चुकने पर निरृति।
Being eaten, she is poverty; eaten, she is Nirrti.
- ३८
अशिता लोकाच् छिनत्ति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यम् अस्माच् चामुष्माच् च ॥३८॥ {२७}
खाई जा चुकी ब्रह्मगवी ब्राह्मण-पीड़क को इस लोक से और उस लोक से काट देती है।
Once eaten, the Brahman's cow cuts the Brahman's oppressor off from this world and from the world beyond.
- ३९
तस्या आहननं कृत्या मेनिर् आशसनं वलग ऊबध्यम्
उसका वध कृत्या है, उसका काटना शस्त्र है, उसके पेट का अधपचा चारा वलग (गाड़ा हुआ टोना) है।
Her slaughter is witchcraft, her carving a weapon, the half-digested contents of her stomach a buried spell.
- ४०
अस्वगता परिह्णुता
छिपाई गई (या नकारी गई) वह बेघरपन है।
Concealed (or denied), she is homelessness.
- ४१
अग्निः क्रव्याद् भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति
क्रव्याद् (शव-भक्षी) अग्नि बनकर ब्रह्मगवी ब्राह्मण-पीड़क में घुसती है और उसे खा जाती है।
Becoming flesh-eating Agni, the Brahman's cow enters the Brahman's oppressor and devours him.
- ४२
सर्वास्याङ्गा पर्वा मूलानि वृश्चति
वह उसके सब अंग, जोड़ और जड़ें काट डालती है।
She hacks apart all his limbs, his joints, his roots.
- ४३
छिनत्त्य् अस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु
वह उसके पिता के पक्ष के बन्धुओं को काट देती है और माता के पक्ष के बन्धुओं को नष्ट कर देती है।
She cuts off his father's kin and destroys his mother's kin.
- ४४
विवाहां ज्ञातीन्त् सर्वान् अपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना
यदि क्षत्रिय उसे लौटाता नहीं, तो ब्रह्मगवी ब्राह्मण-पीड़क के विवाह-सम्बन्धों और सब जाति-बन्धुओं को भी नष्ट कर देती है।
If the Kshatriya does not give her back, the Brahman's cow destroys the oppressor's marriage ties and all his kinsmen too.
- ४५
अवास्तुम् एनम् अस्वगम् अप्रजसं करोत्य् अपरापरणो भवति क्षीयते
वह उसे बेघर, अपनों से रहित और निःसन्तान कर देती है; उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं रहता और वह क्षीण होता जाता है।
She makes him homeless, kinless and childless; he is left without successor and wastes away.
- ४६
य एवं विदुषो ब्राह्मणस्य क्षत्रियो गाम् आदत्ते ॥४६॥ {२८}
— उस क्षत्रिय को, जो ऐसा जानने वाले ब्राह्मण की गाय छीनता है।
— the Kshatriya who takes the cow of a Brahman who knows this.
- ४७
क्षिप्रं वै तस्याहनने ग्ŕ̥ध्राः कुर्वत ऐलबम्
शीघ्र ही उसके मारे जाने के स्थान पर गिद्ध कोलाहल (ऐलब) करते हैं।
Soon vultures raise their clamour where he is struck down.
- ४८
क्षिप्रं वै तस्यादहनं परि नृत्यन्ति केशिनीर् आघ्नानाः पाणिनोरसि कुर्वाणाः पापम् ऐलबम्
शीघ्र ही उसकी चिता के चारों ओर खुले केशों वाली स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटती, अशुभ विलाप करती नाचती हैं।
Soon around his pyre long-haired women dance, beating their breasts with their hands and raising an evil wail.
- ४९
क्षिप्रं वै तस्य वास्तुषु व्ŕ̥काः कुर्वत ऐलबम्
शीघ्र ही उसके घरों में भेड़िये कोलाहल करते हैं।
Soon wolves raise their clamour in his dwellings.
- ५०
क्षिप्रं वै तस्य पृछन्ति यत् तद् आसी३द् इदं नु ता३द् इति
शीघ्र ही लोग उसके बारे में पूछते हैं — 'जो वह था, क्या यह वही है?'
Soon people ask about him: "What was that? Is this that?"
- ५१
छिन्ध्य् आ छिन्धि प्र छिन्ध्य् अपि क्षापय क्षापय
(अब गौ से:) (ब्राह्मण-पीड़क को) काट, काट डाल, पूरी तरह काट; नष्ट कर, नष्ट कर।
(To the cow:) Cut, cut in, cut through (the Brahman's oppressor); destroy, destroy (him)!
- ५२
आददानम् आङ्गिरसि ब्रह्मज्यम् उप दासय
हे आङ्गिरसी, (तुझे) छीनने वाले ब्राह्मण-पीड़क को क्षीण कर दे।
O Angirasi, waste away the Brahman's oppressor who takes you.
- ५४
ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः
जलाती हुई, पूरी तरह झुलसाती हुई, तू ब्रह्म का वज्र है।
Burning, scorching all over, you are the thunderbolt of brahman.
- ५५
क्षुरपविर् मृत्युर् भूत्वा वि धाव त्वम्
छुरे की धार वाली मृत्यु बनकर तू चारों ओर दौड़।
Become razor-edged death and run out in every direction.
- ५६
आ दत्से जिनतां वर्च इष्टं पूर्तं चाशिषः
तू सताने वालों का वर्चस्, उनका इष्ट (यज्ञ), पूर्त (दान-कर्म) और उनकी कामनाएँ छीन लेती है।
You take away the oppressors' lustre, their sacrifices and pious gifts, and their hopes.
- ५७
आदाय जीतं जीताय लोके᳙ ऽमुष्मिन् प्र यछसि
छीनी हुई वस्तु लेकर तू उसे उस लोक में उसी पीड़ित को दे देती है जिससे वह छीनी गई थी।
Taking what was wrested away, you give it in the world beyond to the one it was wrested from.
- ५८
अघ्न्ये पदवीर् भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या
हे अघ्न्या, ब्राह्मण के शाप से तू (अपराधी का) पीछा करने वाली बन।
O inviolable one, through the Brahman's curse become the one who tracks him down.
- ५९
मेनिः शरव्या᳙ भवाघाद् अघविषा भव
शस्त्र बन, बाणों की बौछार बन; पाप के कारण घोर विष वाली बन।
Become a weapon, a hail of arrows; because of the wrong done, become deadly poison.
- ६०
अघ्न्ये प्र शिरो जहि ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोर् अराधसः
हे अघ्न्या, ब्राह्मण-पीड़क, अपराधी, देव-निन्दक और अदानी का सिर काट गिरा।
O inviolable one, strike off the head of the Brahman's oppressor, the guilty, the scorner of the gods, the ungenerous.
- ६१
त्वया प्रमूर्णं मृदितम् अग्निर् दहतु दुश्चितम् ॥६१॥ {२९}
तेरे द्वारा कुचले और रौंदे गए उस दुष्ट-चित्त को अग्नि जला दे।
Crushed and trampled by you, let Agni burn up that evil-minded man.
- ६२
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह
(गौ से:) (उसे) काट, काट डाल, पूरी तरह काट; जला, जला डाल, पूरी तरह जला।
(To the cow:) Hew, hew away, hew (him) to pieces; burn, burn away, burn (him) up.
- ६३
ब्रह्मज्यं देव्य् अघ्न्य आ मूलाद् अनुसंदह
हे देवी अघ्न्या, ब्राह्मण-पीड़क को जड़ से जला डाल।
O goddess, inviolable one, burn the Brahman's oppressor down to the root.
- ६४
यथायाद् यमसादनात् पापलोकान् परावतः
जिससे वह यम के धाम से दूर के पाप-लोकों में चला जाए।
so that he goes from Yama's seat to the far-off worlds of evil.
- ६५
एवा त्वं देव्य् अघ्न्ये ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोर् अराधसः
इसी प्रकार, हे देवी अघ्न्या, तू ब्राह्मण-पीड़क, अपराधी, देव-निन्दक और अदानी के —
So, O goddess, inviolable one, of the Brahman's oppressor, the guilty, the scorner of the gods, the ungenerous —
- ६६
वज्रेण शतपर्वणा तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना
— सौ जोड़ों वाले, तीखे, छुरे की धार वाले वज्र से —
— with the hundred-jointed thunderbolt, sharp and razor-edged —
- ६७
प्र स्कन्धान् प्र शिरो जहि
— कन्धे और सिर काट गिरा।
— strike off the shoulders and the head.
- ६८
लोमान्य् अस्य सं छिन्धि त्वचम् अस्य वि वेष्टय
उसके बाल काट डाल, उसकी खाल उधेड़ दे।
Cut off his hair; strip off his skin.
- ६९
मांसान्य् अस्य शातय स्नावान्य् अस्य सं वृह
उसका मांस काट-काट गिरा, उसकी नसें उखाड़ दे।
Hack off his flesh; tear out his sinews.
- ७०
अस्थीन्य् अस्य पीडय मज्जानम् अस्य निर् जहि
उसकी हड्डियाँ पीस दे, उसकी मज्जा बाहर निकाल दे।
Crush his bones; strike out his marrow.
- ७१
सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय
उसके सब अंग और जोड़ ढीले कर दे।
Loosen all his limbs and joints.
- ७२
अग्निर् एनं क्रव्यात् पृथिव्या नुदताम् उद् ओषतु वायुर् अन्तरिक्षान् महतो वरिम्णः
क्रव्याद् अग्नि उसे पृथ्वी से धकेले और जला दे; वायु उसे अन्तरिक्ष के महान् विस्तार से धकेले।
Let flesh-eating Agni thrust him from the earth and burn him up; let Vayu thrust him from the atmosphere, from its great expanse.
- ७३
सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्य् ओ᳙षतु ॥७३॥ {३०}
सूर्य उसे द्युलोक से धकेले और नीचे की ओर जला दे।
Let Surya thrust him from heaven and burn him down.