अथर्ववेदAtharvavedaAV 6.130

प्रेम-आकर्षण का मन्त्रLove charm to win a man

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    रथजितां राथजितेयीनाम् अप्सरसाम् अयं स्मरः ।देवाः प्र हिणुत स्मरम् असौ माम् अनु शोचतु

    यह स्मर (प्रेम की चाह) रथजित् और राथजितेयी अप्सराओं का है। हे देवो, स्मर को भेजो; वह (अमुक) मेरे लिए विरह में जले।

    This longing belongs to the Apsarases, the chariot-winners and the daughters of chariot-winners. Gods, send the longing forth; let that man burn for me.

  2. २

    असौ मे स्मरताद् इति प्रियो मे स्मरताद् इति ।देवाः प्र हिणुत स्मरम् असौ माम् अनु शोचतु

    'वह मुझे याद करे', 'मेरा प्रिय मुझे याद करे' — (ऐसा हो)। हे देवो, स्मर को भेजो; वह मेरे लिए विरह में जले।

    'Let him remember me,' 'let my beloved remember me.' Gods, send the longing forth; let that man burn for me.

  3. ३

    यथा मम स्मराद् असौ नामुष्याहं कदा चन ।देवाः प्र हिणुत स्मरम् असौ माम् अनु शोचतु

    ऐसा हो कि वह मुझे याद करे, पर मैं उसे कभी नहीं। हे देवो, स्मर को भेजो; वह मेरे लिए विरह में जले।

    So that he remembers me, while I never remember him. Gods, send the longing forth; let that man burn for me.

  4. ४

    उन् मादयत मरुत उद् अन्तरिक्ष मादय ।अग्न उन् मादया त्वम् असौ माम् अनु शोचतु

    हे मरुतो, (उसे प्रेम में) उन्मत्त करो; हे अन्तरिक्ष, उन्मत्त करो; हे अग्नि, तुम उन्मत्त करो; वह मेरे लिए विरह में जले।

    Maruts, drive (him) mad (with longing); atmosphere, drive (him) mad; Agni, drive (him) mad; let that man burn for me.