अथर्ववेदAtharvavedaAV 6.1
सविता की स्तुतिPraise of Savitar
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- १
दोषो गाय बृहद् गाय द्युमद् धेहि ।आथर्वण स्तुहि देवं सवितारम्
सन्ध्या को गाओ, ऊँचे स्वर में (बृहत्) गाओ, दीप्तिमान स्तुति अर्पित करो; हे आथर्वण, देव सविता की स्तुति करो।
Sing at evening, sing out loud, offer something radiant; Atharvana, praise the god Savitar.
- २
तम् उ ष्टुहि यो अन्तः सिन्धौ सूनुः ।सत्यस्य युवानम् अद्रोघवाचं सुशेवम्
उसी की स्तुति करो जो सिन्धु (जल) के भीतर पुत्र है, सत्य का युवा, जिसकी वाणी में छल नहीं, और जो अत्यन्त कल्याणकारी है।
Praise him, the son who is within the waters, the youth of truth, whose speech has no deceit, the very kindly one.
- ३
स घा नो देवः सविता साविषद् अम्ŕ̥तानि भूरि ।उभे सुष्टुती सुगातवे
वही देव सविता हमारे लिए बहुत-से अमृत (अमर करने वाले पदार्थ) प्रेरित करे; दोनों उत्तम स्तुतियाँ सुगम मार्ग के लिए हों।
May that god Savitar send us many immortal things; may both good praises serve for an easy way forward.