अथर्ववेदAtharvavedaAV 15.10
व्रात्य अतिथि का राजा द्वारा सत्कारA king's honouring of the Vratya
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
- १
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञो ऽतिथिर् गृहान् आगछेत्
तो जिस राजा के घर ऐसा जानने वाला व्रात्य अतिथि बनकर आए—
So, the king to whose house a Vratya who knows this comes as a guest—
- २
श्रेयांसम् एनम् आत्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्चते
वह उसे अपने से श्रेष्ठ माने; ऐसा करने से वह क्षत्र (राजशक्ति) के प्रति अपराध नहीं करता, और राष्ट्र के प्रति भी अपराध नहीं करता।
should regard him as greater than himself. By doing so he does no injury to his royal power, and none to his kingdom.
- ३
अतो वै ब्रह्म च क्षत्रं चोद् अतिष्ठतां ते अब्रूतां कं प्र विशावेति
इसी से ब्रह्म और क्षत्र उत्पन्न हुए। उन दोनों ने कहा, 'हम किसमें प्रवेश करें?'
From him, indeed, brahman and kshatra arose. The two said, 'Whom shall we enter?'
- ४
ब्ŕ̥हस्पतिम् एव ब्रह्म प्रविशत्व् इन्द्रं क्षत्रं तथा वा इति
[उत्तर मिला:] 'ब्रह्म बृहस्पति में प्रवेश करे, और क्षत्र इन्द्र में।' ऐसा ही हो।
[The answer was:] 'Let brahman enter Brihaspati, and kshatra Indra.' So be it.
- ५
अतो वै ब्ŕ̥हस्पतिम् एव ब्रह्म प्राविशद् इन्द्रं क्षत्रम्
इसलिए ब्रह्म ने बृहस्पति में और क्षत्र ने इन्द्र में प्रवेश किया।
So brahman entered Brihaspati, and kshatra entered Indra.
- ६
इयं वा उ पृथिवी ब्ŕ̥हस्पतिर् द्यौर् एवेन्द्रः
यह पृथिवी ही बृहस्पति है, और द्यौ (आकाश) ही इन्द्र है।
This earth is Brihaspati, and the sky is Indra.
- ७
अयं वा उ अग्निर् ब्रह्मासाव् आदित्यः क्षत्रम्
यह अग्नि ही ब्रह्म है, और वह आदित्य (सूर्य) क्षत्र है।
This Agni is brahman, and yonder Aditya, the sun, is kshatra.
- ८
ऐनं ब्रह्म गछति ब्रह्मवर्चसी भवति
उसके पास ब्रह्म आता है, वह ब्रह्मवर्चस् (ब्रह्म-तेज) से युक्त होता है—
Brahman comes to him, and he gains the splendour of brahman—
- ९
यः पृथिवीं ब्ŕ̥हस्पतिम् अग्निं ब्रह्म वेद
जो पृथिवी को बृहस्पति और अग्नि को ब्रह्म जानता है।
the one who knows the earth as Brihaspati and Agni as brahman.
- १०
ऐनम् इन्द्रियं गछतीन्द्रियवान् भवति
उसके पास इन्द्रिय (इन्द्र-सम्बन्धी बल) आता है, वह बलवान होता है—
Indra's power comes to him, and he becomes powerful—
- ११
य आदित्यं क्षत्रं दिवम् इन्द्रं वेद
जो आदित्य को क्षत्र और द्यौ को इन्द्र जानता है।
the one who knows Aditya as kshatra and the sky as Indra.