यजुर्वेदYajurvedaTS 6.1.4

दीक्षित के व्रत-नियमRules for the consecrated sacrificer

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    वाग्वै दे॒वेभ्योऽपा᳚क्रामद्य॒ज्ञायाति॑ष्ठमाना॒ सा वन॒स्पती॒न्प्रावि॑श॒थ्सैषा वाग्वन॒स्पति॑षु वदति॒ या दु॑न्दु॒भौ या तूण॑वे॒ या वीणा॑यां॒ यद्दी᳚क्षितद॒ण्डं प्र॒यच्छ॑ति॒ वाच॑मे॒वाव॑ रुंध॒ औदुं॑बरो भव॒त्यूर्ग्वा उ॑दुं॒बर॒ ऊर्ज॑मे॒वाव॑ रुंधे॒ मुखे॑न॒ सं मि॑तो भवति मुख॒त ए॒वास्मा॒ ऊर्जं॑ दधाति॒ तस्मा᳚न्मुख॒त ऊ॒र्जा भु॑ञ्जते २६ क्री॒ते सोमे॑ मैत्रावरु॒णाय॑ द॒ण्डं प्र य॑च्छति मैत्रावरु॒णो हि पु॒रस्ता॑दृ॒त्विग्भ्यो॒ वाचं॑ वि॒भज॑ति॒ तामृ॒त्विजो॒ यज॑माने॒ प्रति॑ ष्ठापयन्ति॒ स्वाहा॑ य॒ज्ञं मन॒सेत्या॑ह॒ मन॑सा॒ हि पुरु॑षो य॒ज्ञम॑भि॒गच्छ॑ति॒ स्वाहा॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॒मित्या॑ह॒ द्यावा॑पृथि॒व्योर्हि य॒ज्ञः स्वाहो॒रोर॒न्तरि॑क्षा॒दित्या॑हा॒न्तरि॑क्षे॒ हि य॒ज्ञः स्वाहा॑ य॒ज्ञं वाता॒दार॑भ॒ इत्या॑हा॒यं २७ वाव यः पव॑ते॒ स य॒ज्ञस्तमे॒व सा॒क्षादा र॑भते मु॒ष्टी क॑रोति॒ वाचं॑ यच्छति य॒ज्ञस्य॒ धृत्या॒ अदी᳚क्षिष्टा॒यं ब्रा᳚ह्म॒ण इति॒ त्रिरु॑पा॒ग्॒श्वा॑ह दे॒वेभ्य॑ ए॒वैनं॒ प्राह॒ त्रिरु॒च्चैरु॒भये᳚भ्य ए॒वैनं॑ देवमनु॒ष्येभ्यः॒ प्राह॒ न पु॒रा नक्ष॑त्रेभ्यो॒ वाचं॒ वि सृ॑जे॒द्यत्पु॒रा नक्ष॑त्रेभ्यो॒ वाचं॑ विसृ॒जेद्य॒ज्ञं विच्छि॑न्द्या॒ २८ दुदि॑तेषु॒ नक्ष॑त्रेषु व्र॒तं कृ॑णु॒तेति॒ वाचं॒ वि सृ॑जति य॒ज्ञव्र॑तो॒ वै दी᳚क्षि॒तो य॒ज्ञमे॒वाभि॒ वाचं॒ वि सृ॑जति॒ यदि॑ विसृ॒जेद्वै᳚ष्ण॒वीमृच॒मनु॑ ब्रूयाद्य॒ज्ञो वै विष्णु॑र्य॒ज्ञेनै॒व य॒ज्ञं सं त॑नोति॒ दैवीं॒ धियं॑ मनामह॒ इत्या॑ह य॒ज्ञमे॒व तन्म्र॑दयति सुपा॒रा नो॑ अस॒द्वश॒ इत्या॑ह॒ व्यु॑ष्टिमे॒वाव॑ रुंधे २९ ब्रह्मवा॒दिनो॑ वदन्ति होत॒व्यं॑ दीक्षि॒तस्य॑ गृ॒हा३ इन हो॑त॒व्या३मिति॑ ह॒विर्वै दी᳚क्षि॒तो यज्जु॑हु॒याद्यज॑मानस्याव॒दाय॑ जुहुया॒द्यन्न जु॑हु॒याद्य॑ज्ञप॒रुर॒न्तरि॑या॒द्ये दे॒वा मनो॑जाता मनो॒युज॒ इत्या॑ह प्रा॒णा वै दे॒वा मनो॑जाता मनो॒युज॒स्तेष्वे॒व प॒रोऽक्षं॑ जुहोति॒ तन्नेव॑ हु॒तं नेवाहु॑तग्ग् स्व॒पन्तं॒ वै दी᳚क्षि॒तं रक्षां॑सि जिघांसन्त्य॒ग्निः ३० खलु॒ वै र॑क्षो॒हाग्ने॒ त्वं सु जा॑गृहि व॒यं सु म॑न्दिषीम॒हीत्या॑हा॒ग्निमे॒वाधि॒पां कृ॒त्वा स्व॑पिति॒ रक्ष॑सा॒मप॑हत्या अव्र॒त्यमि॑व॒ वा ए॒ष क॑रोति॒ यो दी᳚क्षि॒तः स्वपि॑ति॒ त्वम॑ग्ने व्रत॒पा अ॒सीत्या॑हा॒ग्निर्वै दे॒वानां᳚ व्र॒तप॑तिः॒ स ए॒वैनं॑ व्र॒तमा लं॑भयति दे॒व आ मर्त्ये॒ष्वेत्या॑ह दे॒वो ३१ ह्ये॑ष सन्मर्त्ये॑षु॒ त्वं य॒ज्ञेष्वीड्य॒ इत्या॑है॒तं हि य॒ज्ञेष्वीड॒तेऽप॒ वै दी᳚क्षि॒ताथ्सु॑षु॒पुष॑ इंद्रि॒यं दे॒वता᳚ः क्रामन्ति॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॒भि मामाऽव॑वृत्र॒न्नित्या॑हेन्द्रि॒येणै॒वैनं॑ दे॒वता॑भिः॒ सं न॑यति॒ यदे॒तद्यजु॒र्न ब्रू॒याद्याव॑त ए॒व प॒शून॒भि दीक्षे॑त॒ ताव॑न्तोऽस्य प॒शवः॑ स्यू॒ रास्वेय॑थ् ३२ सो॒मा भूयो॑ भ॒रेत्या॒हाप॑रिमिताने॒व प॒शूनव॑ रुंधे च॒न्द्रम॑सि॒ मम॒ भोगा॑य भ॒वेत्या॑ह यथादेव॒तमे॒वैनाः॒ प्रति॑ गृह्णाति वा॒यवे᳚ त्वा॒ वरु॑णाय॒ त्वेति॒ यदे॒वमे॒ता नानु॑दि॒शेदय॑थादेवतं॒ दक्षि॑णा गमये॒दा दे॒वता᳚भ्यो वृश्च्येत॒ यदे॒वमे॒ता अ॑नुदि॒शति॑ यथादेव॒तमे॒व दक्षि॑णा गमयति॒ न दे॒वता᳚भ्य॒ आ ३३ वृ॑श्च्यते॒ देवी॑रापो अपां नपा॒दित्या॑ह॒ यद्वो॒ मेध्यं॑ य॒ज्ञियं॒॒ सदे॑वं॒ तद्वो॒ माव॑ क्रमिष॒मिति॒ वावैतदा॒हाच्छि॑न्नं॒ तन्तुं॑ पृथि॒व्या अनु॑ गेष॒मित्या॑ह॒ सेतु॑मे॒व कृ॒त्वात्ये॑ति भु॒ञ्ज॒तेऽ॒यं

    वाक् देवों से हटकर वनस्पतियों में चली गई, इसलिए वह दुन्दुभि, बाँसुरी और वीणा में बोलती है; दीक्षित को उदुम्बर का मुँह तक ऊँचा दण्ड देकर वह वाक् और ऊर्ज (बल, अन्न) प्राप्त करता है, और सोम खरीदे जाने पर यह दण्ड मैत्रावरुण को दिया जाता है, क्योंकि वही ऋत्विजों में वाक् बाँटता है। 'स्वाहा यज्ञं मनसा' आदि मन्त्रों से वह मन, द्यावापृथिवी, अन्तरिक्ष और वायु में स्थित यज्ञ को पकड़ता है, मुट्ठियाँ बाँधकर मौन रहता है, और 'यह ब्राह्मण दीक्षित हुआ' तीन बार धीमे (देवों के लिए) और तीन बार ऊँचे (देवों और मनुष्यों के लिए) कहा जाता है। तारे निकलने से पहले वह मौन न तोड़े, नहीं तो यज्ञ टूटता है; तारे निकलने पर 'व्रत तैयार करो' कहकर मौन तोड़ता है, और यदि पहले तोड़ दे तो विष्णु की ऋचा पढ़े, क्योंकि यज्ञ ही विष्णु है। दीक्षित स्वयं हवि है, इसलिए उसके घर में आहुति 'ये देवा मनोजाता मनोयुजः' से प्राणों में परोक्ष रूप से दी जाती है — वह न हुत है न अहुत; सोते दीक्षित को राक्षस मारना चाहते हैं, इसलिए वह 'अग्ने त्वं सु जागृहि' आदि से रक्षोहा अग्नि को रक्षक बनाकर सोता है, जो व्रतपति है और उसे व्रत फिर से दिलाता है। सोने से उससे इन्द्रिय-बल और देवता हट जाते हैं, जिन्हें 'विश्वे देवा अभि माम्' से वापस जोड़ा जाता है; 'हे सोम, इतना दो, और अधिक लाओ' से असीमित पशु मिलते हैं, 'वायवे त्वा, वरुणाय त्वा' से दक्षिणा अपने-अपने देवता को सौंपी जाती है ताकि वह देवताओं से कट न जाए, और 'देवीरापः' तथा 'अच्छिन्नं तन्तुम्' कहकर वह जल पर मानो सेतु बनाकर पार जाता है।

    Speech left the gods, unwilling to serve the sacrifice, and entered the trees, so it speaks in the drum, the flute and the vina; by handing the consecrated man a staff of udumbara wood that reaches to his mouth, he secures speech and strength (ūrj), and once the soma is bought the staff goes to the Maitravaruna, who distributes speech among the priests. With 'svāhā, the sacrifice with the mind' and the formulas that follow, he takes hold of the sacrifice in mind, heaven and earth, the midspace and the wind; he clenches his fists and keeps silent, and 'this brahmin has been consecrated' is said three times softly (to the gods) and three times aloud (to gods and men). He must not break silence before the stars appear, or he would cut the sacrifice; when they have risen he breaks it with 'prepare the vow-milk', and if he speaks too early he recites a verse to Vishnu, since Vishnu is the sacrifice. Because the consecrated man is himself an oblation, offerings in his house are made indirectly into the breaths with 'the gods born of mind, yoked by mind', so they are neither offered nor not offered; and since rakshases try to kill him while he sleeps, he sleeps with Agni, slayer of rakshases and lord of vows, as guardian ('Agni, keep watch...'), and Agni restores his vow. Sleep makes power and the deities leave him, and 'the All-gods have turned to me' brings them back; 'give this much, Soma, bring more' wins unlimited cattle, 'to Vayu you, to Varuna you' sends each gift to its proper deity so that he is not cut off from the gods, and with 'divine waters' and 'may I follow the unbroken thread of the earth' he crosses the water as if he had built a bridge.

  2. २

    छि॑न्द्याद्रुंधेऽ॒ग्निरा॑ह दे॒व इय॑द्दे॒वता᳚भ्य॒ आ त्रय॑स्त्रिंशच्च

    यह अनुवाक की अनुक्रमणी है: हर पचास शब्दों वाले खण्ड के अन्तिम शब्द — (भुञ्जते, अयम्,) छिन्द्यात्, रुन्धे, अग्निः, आह देवः, इयत्, देवताभ्य आ — और अन्तिम खण्ड में तैंतीस शब्द।

    This is the anuvaka's index: the closing words of each fifty-word section — (bhuñjate, ayam,) chindyāt, rundhe, agniḥ, āha devaḥ, iyat, devatābhya ā — and thirty-three words in the last section.