यजुर्वेदYajurvedaTS 6.2.8
उत्तरवेदी और परिधियों का विधानThe uttaravedi and the enclosing sticks
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
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सोत्त॑रवे॒दिर॑ब्रवी॒थ्सर्वा॒न्मया॒ कामा॒न्व्य॑श्नव॒थेति॒ ते दे॒वा अ॑कामय॒न्तासु॑रा॒न्भ्रातृ॑व्यान॒भि भ॑वे॒मेति॒ तेऽ॑जुहवुः सिं॒॒हीर॑सि सपत्नसा॒ही स्वाहेति॒ तेऽसु॑रा॒न्भ्रातृ॑व्यान॒भ्य॑भव॒न्तेऽ सु॑रा॒न्भ्रातृ॑व्यानभि॒भूया॑ कामयन्त प्र॒जां वि॑न्देम॒हीति॒ तेऽ॑जुहवुः सिं॒॒हीर॑सि सुप्रजा॒वनिः॒ स्वाहेति॒ ते प्र॒जाम॑विन्दन्त॒ ते प्र॒जां वि॒त्त्वा ४० ऽका॑मयन्त प॒शून्, वि॑न्देम॒हीति॒ तेऽ॑जुहवुः सिं॒॒हीर॑सि रायस्पोष॒वनिः॒ स्वाहेति॒ ते प॒शून॑विन्दन्त॒ ते प॒शून्, वि॒त्त्वाका॑मयन्त प्रति॒ष्ठां वि॑न्देम॒हीति॒ तेऽ॑जुहवुः सिं॒॒हीर॑स्यादित्य॒वनिः॒ स्वाहेति॒ त इ॒मां प्र॑ति॒ष्ठाम॑विन्दन्त॒ त इ॒मां प्र॑ति॒ष्ठां वि॒त्त्वाका॑मयन्त दे॒वता॑ आ॒शिष॒ उपे॑या॒मेति॒ तेऽ॑जुहवुः सिं॒॒हीर॒स्या व॑ह दे॒वान्दे॑वय॒ते ४१ यज॑मानाय॒ स्वाहेति॒ ते दे॒वता॑ आ॒शिष॒ उपा॑य॒न्पञ्च॒ कृत्वो॒ व्याघा॑रयति॒ पञ्चा᳚क्षरा प॒ङ्क्तिः पाङ्क्तो॑ य॒ज्ञो य॒ज्ञमे॒वाव॑ रुंधेऽक्ष्ण॒या व्याघा॑रयति॒ तस्मा॑दक्ष्ण॒या प॒शवोऽङ्गा॑नि॒ प्र ह॑रन्ति॒ प्रति॑ष्ठित्यै भू॒तेभ्य॒स्त्वेति॒ स्रुच॒मुद्गृ॑ह्णाति॒ य ए॒व दे॒वा भू॒तास्तेषां॒ तद्भा॑ग॒धेयं॒ ताने॒व तेन॑ प्रीणाति॒ पौतु॑द्रवान्परि॒धीन्परि॑ दधात्ये॒षां ४२ लो॒कानां॒ विधृ॑त्या अ॒ग्नेस्त्रयो॒ ज्यायां॑सो॒ भ्रात॑र आस॒न्ते दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं वह॑न्तः॒ प्रामी॑यन्त॒ सो᳚ऽग्निर॑बिभेदि॒त्थं वाव स्य आर्ति॒मारि॑ष्य॒तीति॒ स निला॑यत॒ स यां वन॒स्पति॒ष्वव॑स॒त्तां पूतु॑द्रौ॒ यामोष॑धीषु॒ तां सु॑गन्धि॒तेज॑ने॒ यां प॒शुषु॒ तां पेत्व॑स्यान्त॒रा शृङ्गे॒ तं दे॒वताः॒ प्रैष॑मैच्छ॒न्तमन्व॑विन्द॒न्तम॑ब्रुव॒ ४३ न्नुप॑ न॒ आ व॑र्तस्व ह॒व्यं नो॑ व॒हेति॒ सो᳚ऽब्रवी॒द्वरं॑ वृणै॒ यदे॒व गृ॑ही॒तस्याहु॑तस्य बहिः परि॒धि स्कन्दा॒त्तन्मे॒ भ्रातृ॑णां भाग॒धेय॑मस॒दिति॒ तस्मा॒द्यद्गृ॑ही॒तस्याहु॑तस्य बहिः परि॒धि स्कन्द॑ति॒ तेषां॒ तद्भा॑ग॒धेयं॒ ताने॒व तेन॑ प्रीणाति॒ सोऽ॑मन्यतास्थ॒न्वन्तो॑ मे॒ पूर्वे॒ भ्रात॑रः॒ प्रामे॑षता॒स्थानि॑ शातया॒ इति॒ स यान्य॒ ४४ स्थान्यशा॑तयत॒ तत्पूतु॑द्र्वभव॒द्यन्मां॒॒समुप॑मृतं॒ तद्गुल्गु॑लु॒ यदे॒तान्थ्सं॑भा॒रान्थ्सं॒भर॑त्य॒ग्निमे॒व तथ्संभ॑रत्य॒ग्नेः पुरी॑षम॒सीत्या॑हा॒ग्नेर्ह्ये॑तत्पुरी॑षं॒ यथ्सं॑भा॒रा अथो॒ खल्वा॑हुरे॒ते वावैनं॒ ते भ्रात॑रः॒ परि॑ शेरे॒ यत्पौतु॑द्रवाः परि॒धय॒ इति॑
उत्तरवेदी ने कहा, 'मेरे द्वारा तुम सब कामनाएँ पाओगे।' देवों ने क्रम से आहुति दी। 'तुम सिंहनी हो, शत्रुओं को हराने वाली, स्वाहा' से उन्होंने असुर-प्रतिद्वन्द्वियों को हराया। 'उत्तम सन्तान देने वाली', 'धन की पुष्टि देने वाली' और 'आदित्यों को दिलाने वाली' कहकर आहुति देने से उन्हें सन्तान, पशु और यह (पृथ्वी रूपी) प्रतिष्ठा मिली। 'देव-इच्छुक यजमान के लिए देवों को ले आओ, स्वाहा' से वे देवताओं और आशीर्वादों तक पहुँचे। वह पाँच बार घी तिरछा छिड़कता है। पंक्ति छन्द पाँच अक्षरों का है और यज्ञ भी पाँच भागों वाला है, इसलिए इससे वह यज्ञ को पा लेता है। तिरछा छिड़कने के कारण ही पशु अपने अंग तिरछे चलाते हैं; यह स्थिरता के लिए है। 'भूतों के लिए तुम्हें' कहकर वह स्रुच् उठाता है; यह 'भूत' नाम के देवों का भाग है और इससे वह उन्हें प्रसन्न करता है। इन लोकों को अलग-अलग थामे रखने के लिए वह पूतुद्रु की परिधियाँ रखता है। अग्नि के तीन बड़े भाई थे, जो देवों तक हव्य ले जाते हुए मर गए। अग्नि डर गया कि इसी तरह उस पर भी संकट आएगा, और वह छिप गया। वनस्पतियों में वह पूतुद्रु में रहा, ओषधियों में सुगन्धितेजन में, और पशुओं में मेढ़े के सींगों के बीच। देवों ने उसे बुलाना चाहा। उसे खोजकर उन्होंने कहा, 'हमारे पास लौट आओ, हमारा हव्य ले चलो।' उसने वर माँगा कि जो हवि लिया गया पर अर्पित न हुआ हो और परिधि के बाहर गिर जाए, वह उसके भाइयों का भाग हो। इसलिए जो ऐसा गिरता है, वह उन्हीं का भाग है और उससे वह उन्हें प्रसन्न करता है। अग्नि ने सोचा, 'मेरे पहले भाई हड्डियों वाले थे, इसलिए मरे; मैं अपनी हड्डियाँ झाड़ दूँ।' जो हड्डियाँ उसने झाड़ीं, वे पूतुद्रु बनीं, और जो मांस मर गया, वह गुग्गुलु बना। इसलिए जब वह इन सम्भारों को इकट्ठा करता है, तो वह अग्नि को ही इकट्ठा करता है। वह कहता है, 'तुम अग्नि का पुरीष हो', क्योंकि ये सम्भार अग्नि का पुरीष ही हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पूतुद्रु की ये परिधियाँ ही वे भाई हैं, जो उसके चारों ओर लेटे हैं।
The uttaravedi said, 'Through me you will win all your desires.' The gods made offerings one after another. With 'You are a lioness, overcoming rivals, svāhā' they overcame their Asura rivals. Calling her 'winner of good offspring', 'winner of increase of wealth' and 'winner of the Adityas', they gained offspring, cattle, and this earth as a firm foundation. With 'Bring the gods to the god-seeking sacrificer, svāhā' they reached the deities and the blessings. He pours ghee crosswise five times. The pankti metre has five syllables and the sacrifice is fivefold, so in this way he secures the sacrifice. Because he pours it crosswise, animals move their limbs crosswise; this is done for stability. With 'For the beings, you' he lifts the ladle; this is the share of the gods called the Beings, and with it he pleases them. He lays enclosing sticks of putudru wood to hold these worlds apart. Agni had three elder brothers, and they died while carrying the offering to the gods. Agni was afraid that the same harm would come to him, so he hid. Among the trees he stayed in the putudru, among the plants in the sugandhitejana grass, and among the animals between a ram's horns. The gods wanted to call him out. They found him and said, 'Come back to us and carry our offering.' He asked for a boon: whatever offering is taken up but not offered, and spills outside the enclosing sticks, should be his brothers' share. So whatever spills there is their share, and with it he pleases them. Agni thought, 'My earlier brothers had bones, and that is why they died. I will shake off my bones.' The bones he shook off became putudru, and the flesh that died became bdellium. So when he gathers these materials, he is gathering Agni himself. He says, 'You are Agni's purisha', because these materials are Agni's purisha. Some also say that the putudru enclosing sticks are those brothers, lying around him.
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वि॒त्वा दे॑वय॒त ए॒षाम॑ब्रुव॒न्॒ यानि॒ चतु॑श्चत्वारिंशच्च
यह अनुवाक की सूची है: 'वित्त्वा', 'देवयते', 'एषाम्', 'अब्रुवन्', 'यानि', और (अन्तिम भाग में) चौवालीस (शब्द)।
This is the index of the section: 'vittvā', 'devayate', 'eṣām', 'abruvan', 'yāni', and forty-four (words in the last part).