यजुर्वेदYajurvedaTS 5.1.10

उखा-अग्नि का धारणCarrying the fire in the ukhā

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    न ह॑ स्म॒ वै पु॒राग्निरप॑रशुवृक्णं दहति॒ तद॑स्मै प्रयो॒ग ए॒वर्षि॑रस्वदय॒द्यद॑ग्ने॒ यानि॒ कानि॒ चेति॑ स॒मिध॒मा द॑धा॒त्यप॑रशुवृक्णमे॒वास्मै᳚ स्वदयति॒ सर्व॑मस्मै स्वदते॒ य ए॒वं वेदौदुं॑बरी॒मा द॑धा॒त्यूर्ग्वा उ॑दुं॒बर॒ ऊर्ज॑मे॒वास्मा॒ अपि॑ दधाति प्र॒जाप॑तिर॒ग्निम॑सृजत॒ तं सृ॒ष्टं रक्षाग्॑स्य ५२ जिघांस॒न्थ्स ए॒तद्रा᳚क्षो॒घ्नम॑पश्य॒त्तेन॒ वै स रक्षा॒ग्॒स्यपा॑हत॒ यद्रा᳚क्षो॒घ्नं भव॑त्य॒ग्नेरे॒व तेन॑ जा॒ताद्रक्षा॒ग्॒स्यप॑ ह॒न्त्याश्व॑त्थी॒मा द॑धात्यश्व॒त्थो वै वन॒स्पती॑नां सपत्नसा॒हो विजि॑त्यै॒ वैक॑ङ्कती॒मा द॑धाति॒ भा ए॒वाव॑ रुंधे शमी॒मयी॒मा द॑धाति॒ शान्त्यै॒ संशि॑तं मे॒ ब्रह्मोदे॑षां बा॒हू अ॑तिर॒मित्यु॑त्त॒मे औदुं॑बरी ५३ वाचयति॒ ब्रह्म॑णै॒व क्ष॒त्रं स२ं श्य॑ति क्ष॒त्रेण॒ ब्रह्म॒ तस्मा᳚द्ब्राह्म॒णो रा॑ज॒न्य॑वा॒नत्य॒न्यं ब्रा᳚ह्म॒णं तस्मा᳚द्राज॒न्यो᳚ ब्राह्म॒णवा॒नत्य॒न्यं रा॑ज॒न्यं॑ मृ॒त्युर्वा ए॒ष यद॒ग्निर॒मृतं॒॒ हिर॑ण्यं रु॒क्ममन्त॑रं॒ प्रति॑ मुञ्चतेऽ॒मृत॑मे॒व मृ॒त्योर॒न्तर्ध॑त्त॒ एक॑विंशतिनिर्बाधो भव॒त्येक॑विंशति॒र्वै दे॑वलो॒का द्वाद॑श॒ मासाः॒ पञ्च॒र्तव॒स्त्रय॑ इ॒मे लो॒का अ॒सावा॑दि॒त्य ५४ ए॑कविं॒॒श ए॒ताव॑न्तो॒ वै दे॑वलो॒कास्तेभ्य॑ ए॒व भ्रातृ॑व्यम॒न्तरे॑ति निर्बा॒धैर्वै दे॒वा असु॑रान्निर्बा॒धेऽ॑कुर्वत॒ तन्नि॑र्बा॒धानां᳚ निर्बाध॒त्वं नि॑र्बा॒धी भ॑वति॒ भ्रातृ॑व्याने॒व नि॑र्बा॒धे कु॑रुते सावित्रि॒या प्रति॑ मुञ्चते॒ प्रसू᳚त्यै॒ नक्तो॒षासेत्युत्त॑रयाहोरा॒त्राभ्या॑मे॒वैन॒मुद्य॑च्छते दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दा इत्या॑ह प्रा॒णा वै दे॒वा द्र॑विणो॒दा अ॑होरा॒त्राभ्या॑मे॒वैन॑मु॒द्यत्य॑ ५५ प्रा॒णैर्दा॑धा॒रासी॑नः॒ प्रति॑ मुञ्चते॒ तस्मा॒दासी॑नाः प्र॒जाः प्र जा॑यन्ते कृष्णाजि॒नमुत्त॑रं॒ तेजो॒ वै हिर॑ण्यं॒ ब्रह्म॑ कृष्णाजि॒नं तेज॑सा चै॒वैनं॒ ब्रह्म॑णा चोभ॒यतः॒ परि॑ गृह्णाति॒ षडु॑द्यामं शि॒क्यं॑ भवति॒ षड्वा ऋ॒तव॑ ऋ॒तुभि॑रे॒वैन॒मुद्य॑च्छते॒ यद्द्वाद॑शोद्यामं संवथ्स॒रेणै॒व मौ॒ञ्जं भ॑व॒त्यूर्ग्वै मुञ्जा॑ ऊ॒र्जैवैनं॒॒ सम॑र्धयति सुप॒र्णोऽ॑सि ग॒रुत्मा॒नित्यवे᳚क्षते रू॒पमे॒वास्यै॒तन्म॑हि॒मानं॒ व्याच॑ष्टे॒ दिवं॑ गच्छ॒ सुवः॑ प॒तेत्या॑ह सुव॒र्गमे॒वैनं॑ लो॒कं ग॑मयति

    पहले अग्नि बिना कुल्हाड़ी से काटी लकड़ी को नहीं जलाती थी; ऋषि ने प्रयोग के समय उसे अग्नि के लिए स्वादु बनाया — 'यद् अग्ने यानि कानि च' कहकर समिधा रखने से वह बिना कटी लकड़ी को भी उसके लिए स्वादु बना देता है, और जो ऐसा जानता है उसके लिए सब स्वादु हो जाता है। उदुम्बर की समिधा इसलिए कि उदुम्बर ऊर्ज् (पोषक रस) है; प्रजापति ने अग्नि को रचा तो राक्षस उसे मारना चाहते थे, उन्होंने यह राक्षोघ्न (मन्त्र) देखकर उन्हें भगाया — इसलिए इससे जन्मी अग्नि से राक्षस दूर किए जाते हैं; अश्वत्थ की समिधा विजय के लिए (अश्वत्थ वनस्पतियों में शत्रु-विजेता है), वैकङ्कत की आभा पाने के लिए, शमी की शान्ति के लिए। अन्तिम दो उदुम्बर समिधाओं पर 'संशितं मे ब्रह्म' और 'उद् एषां बाहू अतिरम्' बुलवाता है — इससे ब्रह्म से क्षत्र और क्षत्र से ब्रह्म तीक्ष्ण होता है; इसीलिए राजन्य वाला ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण से, और ब्राह्मण वाला राजन्य दूसरे राजन्य से आगे रहता है। अग्नि मृत्यु है, सोना अमृत है; सोने का रुक्म भीतर की ओर पहनकर वह मृत्यु और अपने बीच अमृत रख लेता है; उसमें इक्कीस उभार होते हैं, क्योंकि देवलोक इक्कीस हैं — बारह मास, पाँच ऋतुएँ, ये तीन लोक और इक्कीसवाँ वह आदित्य — इनसे वह शत्रु को अलग कर देता है; देवों ने उभारों (निर्बाध) से असुरों को बाहर धकेला, यही 'निर्बाध' नाम का कारण है। सावित्री ऋचा से वह रुक्म पहनता है प्रेरणा के लिए; अगली ऋचा 'नक्तोषासा' से दिन-रात द्वारा उसे (अग्नि को) ऊपर उठाता है; 'देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाः' — द्रविण देने वाले देव प्राण हैं, अतः दिन-रात से उठाकर प्राणों से उसे धारण करता है। बैठकर पहनता है, इसलिए प्रजाएँ बैठी हुई जन्म लेती हैं; ऊपर काला मृगचर्म होता है — सोना तेज है, मृगचर्म ब्रह्म है, इस प्रकार दोनों ओर से उसे तेज और ब्रह्म से घेरता है। छींका छह डोरियों वाला होता है, क्योंकि ऋतुएँ छह हैं; बारह डोरियों वाला हो तो संवत्सर से उठाता है; वह मूँज का होता है, क्योंकि मूँज ऊर्ज् है। 'सुपर्णोऽसि गरुत्मान्' कहकर (अग्नि को) देखता है और इस प्रकार उसका रूप और महिमा बताता है; 'दिवं गच्छ सुवः पत' कहकर उसे स्वर्ग लोक तक पहुँचाता है।

    Formerly Agni would not burn wood not cut with an axe; the rishi made it palatable to him at the time of use: by laying on a kindling stick with 'Whatever, Agni, ...' one makes even uncut wood palatable to him, and everything becomes palatable to one who knows this. An udumbara stick is laid on because udumbara is nourishment (ūrj). When Prajapati created Agni, the rakshasas tried to kill him as he was born; Prajapati saw this rakshas-killing verse and used it to drive them off, so the verse drives the rakshasas away from the newborn Agni. An ashvattha stick is for victory, since among trees the ashvattha overcomes rivals; a vaikankata stick is to gain radiance; a shami stick is for appeasement. He has the sacrificer recite 'Sharpened is my brahman' and 'I have raised up their arms' over the last two udumbara sticks: brahman sharpens kshatra and kshatra sharpens brahman, which is why a brahmin backed by a rajanya surpasses other brahmins, and a rajanya backed by a brahmin surpasses other rajanyas. Agni is death and gold is immortality; by putting the gold plate (rukma) on next to his body he sets immortality between himself and death. The plate has twenty-one knobs because there are twenty-one worlds of the gods: twelve months, five seasons, these three worlds, and yonder sun as the twenty-first, and he shuts his rival out of them. With knobs (nirbādha) the gods drove the asuras out, which is how knobs got their name; wearing them, he drives his rivals out. He puts the plate on with a Savitri verse, for impulsion; with the next verse, 'Night and Dawn', he lifts the fire up by means of day and night. He recites 'The wealth-giving gods held Agni': the wealth-giving gods are the breaths, so having lifted it by day and night he holds it with the breaths. He puts the plate on while seated, which is why creatures are born seated. The black antelope skin goes on top: gold is brilliance and the skin is brahman, so he surrounds him on both sides with brilliance and brahman. The sling has six cords, because there are six seasons, so he lifts the fire with the seasons; if it has twelve cords, he lifts it with the year. It is of munja grass, because munja is nourishment. He looks at the fire saying 'You are the eagle Garutmant', and so declares its form and its greatness; he says 'Go to the sky, fly to heaven', and so sends it to the heavenly world.

  2. २

    रक्षा॒ग्॒स्यौदुं॑बरी आदि॒त्य उ॒द्यत्य॒ सं चतु॑र्विंशतिश्च

    (अनुवाक-सूची:) 'रक्षांसि', 'औदुम्बरी', 'आदित्य', 'उद्यत्य', 'सम्' — और चौबीस।

    (Section index:) 'rakṣāṃsi', 'auduṃbarī', 'āditya', 'udyatya', 'sam' — and twenty-four.