यजुर्वेदYajurvedaTS 4.3.2
प्राणभृत् ईंटों का उपधानLaying the prāṇabhṛt bricks
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
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४। ३। १॥ २ अ॒यं पु॒रो भुव॒स्तस्य॑ प्रा॒णो भौ॑वाय॒नो व॑स॒न्तः प्रा॑णाय॒नो गा॑य॒त्री वा॑स॒न्ती गा॑यत्रि॒यै गा॑य॒त्रं गा॑य॒त्रा दु॑पां॒॒शुरु॑पां॒॒शोस्त्रि॒वृत् त्रि॒वृतो॑ रथंत॒रं र॑थंत॒राद्वसि॑ष्ठ॒ ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ त्वया᳚ प्रा॒णं गृ॑ह्णामि प्र॒जाभ्योऽ॒यं द॑क्षि॒णा वि॒श्वक॑र्मा॒ तस्य॒ मनो॑ वैश्वकर्म॒णं ग्री॒ष्मो मा॑न॒सस्त्रि॒ष्टुग्ग्रै॒ष्मी त्रि॒ष्टुभ॑ ऐ॒डमै॒डाद॑न्तर्या॒मो᳚ऽन्तर्या॒मात्प॑ञ्चद॒शः प॑ञ्चद॒शाद्बृ॒हद्बृ॑ह॒तो भ॒रद्वा॑ज॒ ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ त्वया॒ मनो॑ ३ गृह्णामि प्र॒जाभ्यो॒यं प॒श्चाद्वि॒श्वव्य॑चा॒स्तस्य॒ चक्षु॑र्वैश्वव्यच॒सं व॒र्॒षाणि॑ चाक्षु॒षाणि॒ जग॑ती वा॒र्षी जग॑त्या॒ ऋक्ष॑म॒मृक्ष॑माच्छु॒क्रः शु॒क्राथ्स॑प्तद॒शः स॑प्तद॒शाद्वै॑रू॒पं वै॑रू॒पाद्वि॒श्वामि॑त्र॒ ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ त्वया॒ चक्षु॑र्गृह्णामि प्र॒जाभ्य॑ इ॒दमु॑त्त॒राथ्सुव॒स्तस्य॒ श्रोत्रं॑ सौ॒वं श॒रच्छ्रौ॒त्र्य॑नु॒ष्टुप्छा॑र॒द्य॑नु॒ष्टुभः॑ स्वा॒र२ं स्वा॒रान्म॒न्थी म॒न्थिन॑ एकविं॒॒श ए॑कविं॒॒शाद्वै॑रा॒जं वै॑रा॒जाज्ज॒मद॑ग्नि॒र्॒ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ ४ त्वया॒ श्रोत्रं॑ गृह्णामि प्र॒जाभ्य॑ इ॒यमु॒परि॑ म॒तिस्तस्यै॒ वाङ्मा॒ती हे॑म॒न्तो वा᳚च्याय॒नः प॒ङ्क्तिर्है॑म॒न्ती प॒ङ्क्त्यै नि॒धन॑वन्नि॒धन॑वत आग्रय॒ण आ᳚ग्रय॒णात्त्रि॑णवत्रयस्त्रिं॒॒शौ त्रि॑णवत्रयस्त्रिं॒॒शाभ्यां॑ शाक्वररैव॒ते शा᳚क्वररैव॒ताभ्यां᳚ वि॒श्वक॒र्मर्षिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ त्वया॒ वाचं॑ गृह्णामि प्र॒जाभ्यः॑ त्वया॒ मनो॑ ज॒मद॑ग्नि॒र्॒
यह पूर्व में भुव है। उसका प्राण भुव से है, वसन्त प्राण से, गायत्री वसन्त की है। गायत्री से गायत्र साम, उससे उपांशु ग्रह, उससे त्रिवृत् स्तोम, उससे रथन्तर साम, और रथन्तर से वसिष्ठ ऋषि। प्रजापति द्वारा ग्रहण की गई तुझ (ईंट) से मैं प्रजाओं के लिए प्राण ग्रहण करता हूँ। इसी क्रम में: दक्षिण में विश्वकर्मा — मन, ग्रीष्म, त्रिष्टुभ्, ऐड साम, अन्तर्याम ग्रह, पञ्चदश स्तोम, बृहत् साम, भरद्वाज ऋषि — मैं मन ग्रहण करता हूँ। पश्चिम में विश्वव्यचस् — चक्षु, वर्षा, जगती, ऋक्षम साम, शुक्र ग्रह, सप्तदश स्तोम, वैरूप साम, विश्वामित्र ऋषि — मैं चक्षु ग्रहण करता हूँ। उत्तर में सुवः — श्रोत्र, शरद्, अनुष्टुभ्, स्वार साम, मन्थी ग्रह, एकविंश स्तोम, वैराज साम, जमदग्नि ऋषि — मैं श्रोत्र ग्रहण करता हूँ। ऊपर मति — वाक्, हेमन्त, पङ्क्ति, निधनवत् साम, आग्रयण ग्रह, त्रिणव और त्रयस्त्रिंश स्तोम, शाक्वर और रैवत साम, विश्वकर्मा ऋषि — मैं प्रजाओं के लिए वाक् ग्रहण करता हूँ।
This one in the east is Bhuva. His breath comes from Bhuva, spring from breath, and the gāyatrī belongs to spring. From the gāyatrī comes the gāyatra sāman, from that the upāṃśu cup, from that the threefold stoma, from that the rathantara sāman, and from the rathantara the seer Vasiṣṭha. With you (brick), taken up by Prajāpati, I take up breath for the offspring. In the same pattern: in the south Viśvakarman, with mind, summer, triṣṭubh, the aiḍa sāman, the antaryāma cup, the fifteenfold stoma, the bṛhat and the seer Bharadvāja (I take up mind). In the west Viśvavyacas, with eye, the rains, jagatī, the ṛkṣama sāman, the śukra cup, the seventeenfold stoma, the vairūpa and the seer Viśvāmitra (I take up the eye). In the north Suvaḥ, with ear, autumn, anuṣṭubh, the svāra sāman, the manthin cup, the twenty-onefold stoma, the vairāja and the seer Jamadagni (I take up the ear). Above, Mati, with speech, winter, paṅkti, the nidhanavat sāman, the āgrayaṇa cup, the twenty-sevenfold and thirty-threefold stomas, the śākvara and raivata sāmans and the seer Viśvakarman (I take up speech for the offspring).
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ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया त्रिं॒॒शच्च॑
यह मन्त्र नहीं है, अनुवाक की सूचक-पंक्ति है। इसमें 'त्वया मनो', 'जमदग्निर् ऋषिः' और 'प्रजापतिगृहीतया' उन खण्डों के आरम्भिक शब्द हैं, और 'त्रिंशच्च' (और तीस) बताता है कि अन्तिम खण्ड में तीस पद हैं।
This is not a mantra but the anuvāka's index line. The words 'tvayā mano', 'jamadagnir ṛṣiḥ' and 'prajāpatigṛhītayā' are the opening words of its sections, and 'triṃśac ca' ('and thirty') says that the last section has thirty words.