१ल॒भे॒त॒ वरु॑णं व॒शैतामविं॑ व॒शामा॑दि॒त्येभ्यः॒ कामा॑य म॒ल्॒हा आ लभे॑त॒ तान्ये॒व सैवास्मि॒न्थ्सोमः॑ श्वे॒तोभ॑वति॒ त्रिच॑त्वारिं शच्च ॥ २। १। २॥ १६ दे॒वा॒सु॒रा ए॒षु लो॒केष्व॑स्पर्धन्त॒ स ए॒तं विष्णु॑र्वाम॒नम॑पश्य॒त्त२ं स्वायै॑ दे॒वता॑या॒ आल॑भत॒ ततो॒ वै स इ॒मान् लो॒कान॒भ्य॑जयद्वैष्ण॒वं वा॑म॒नमाल॑भेत॒ स्पर्ध॑मानो॒ विष्णु॑रे॒व भू॒त्वेमा३ंल्लो॒कान॒भि ज॑यति॒ विष॑म॒ आ ल॑भेत॒ विष॑मा इव॒ हीमे लो॒काः समृ॑द्ध्या॒ इंद्रा॑य मन्यु॒मते॒ मन॑स्वते ल॒लामं॑ प्राशृ॒ङ्गमा ल॑भेत संग्रा॒मे १७ संय॑त्त इंद्रि॒येण॒ वै म॒न्युना॒ मन॑सा संग्रा॒मं ज॑य॒तींद्र॑मे॒व म॑न्यु॒मन्तं॒ मन॑स्वन्त॒ग्ग्॒ स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मि॑न्निंद्रि॒यं म॒न्युं मनो॑ दधाति॒ जय॑ति॒ तं सं॑ग्रा॒ममिंद्रा॑य म॒रुत्व॑ते पृश्निस॒क्थमा ल॑भेत॒ ग्राम॑काम॒ इंद्र॑मे॒व म॒रुत्व॑न्त॒ग्ग्॒ स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मै॑ सजा॒तान् प्र य॑च्छति ग्रा॒म्ये॑व भ॑वति॒ यदृ॑ष॒भस्तेनैं॒ १८ द्रो यत्पृश्नि॒स्तेन॑ मारु॒तः समृ॑द्ध्यै प॒श्चात्पृ॑श्निस॒क्थो भ॑वति पश्चादन्ववसा॒यिनी॑मे॒वास्मै॒ विशं॑ करोति सौ॒म्यं ब॒भ्रुमा ल॑भे॒तान्न॑कामः सौ॒म्यं वा अन्नं॒॒ सोम॑मे॒व स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मा॒ अन्नं॒ प्रय॑च्छत्यन्ना॒द ए॒व भ॑वति ब॒भ्रुर्भ॑वत्ये॒तद्वा अन्न॑स्य रू॒पं समृ॑द्ध्यै सौ॒म्यं ब॒भ्रुमा ल॑भेत॒ यमलं॑ १९ रा॒ज्याय॒ सन्तं॑ रा॒ज्यं नोप॒नमे᳚थ्सौ॒म्यं वै रा॒ज्यं सोम॑मे॒व स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मै॑ रा॒ज्यं प्रय॑च्छ॒त्युपै॑नं रा॒ज्यं न॑मति ब॒भ्रुर्भ॑वत्ये॒तद्वै सोम॑स्य रू॒पं समृ॑द्ध्या॒ इंद्रा॑य वृत्र॒तुरे॑ ल॒लामं॑ प्राशृ॒ङ्गमा ल॑भेत ग॒तश्री᳚ः प्रति॒ष्ठाका॑मः पा॒प्मान॑मे॒व वृ॒त्रं ती॒र्त्वा प्र॑ति॒ष्ठां ग॑च्छ॒तींद्रा॑याभिमाति॒घ्ने ल॒लामं॑ प्राशृ॒ङ्गमा २० ल॑भेत॒ यः पा॒प्मना॑ गृही॒तः स्यात्पा॒प्मा वा अ॒भिमा॑ति॒रिंद्र॑मे॒वाभि॑माति॒हन॒ग्ग्॒ स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मा᳚त् पा॒प्मान॑म॒भिमा॑तिं॒ प्र णु॑दत॒ इंद्रा॑य व॒ज्रिणे॑ ल॒लामं॑ प्राशृ॒ङ्गमा ल॑भेत॒ यमलं॑ रा॒ज्याय॒ सन्तं॑ रा॒ज्यं नोप॒नमे॒दिंद्र॑मे॒व व॒ज्रिण॒ग्ग्॒ स्वेन॑ भाग॒धेये॒नोप॑ धावति॒ स ए॒वास्मै॒ वज्रं॒ प्रय॑च्छति॒ स ए॑नं॒ वज्रो॒ भूत्या॑ इन्ध॒ उपै॑नं रा॒ज्यं न॑मति ल॒लामः॑ प्राशृ॒ङ्गो भ॑वत्ये॒तद्वै वज्र॑स्य रू॒पं समृ॑द्ध्यै
(पिछले खण्ड का अन्त: आदित्यों के लिए किसी कामना से गलकम्बल वाली बकरियों का आलभन करे।) देव और असुर इन लोकों के लिए होड़ कर रहे थे। तब विष्णु ने इस बौने पशु को देखा, अपने ही देवता के लिए उसका आलभन किया और इन लोकों को जीत लिया। इसलिए होड़ में लगा व्यक्ति विष्णु के लिए बौने पशु का आलभन करे और विष्णु बनकर इन लोकों को जीतता है। वह इसे ऊबड़-खाबड़ भूमि पर करे, क्योंकि ये लोक भी ऊबड़-खाबड़ जैसे हैं। युद्ध में उतरा व्यक्ति मन्यु और मन से युक्त इन्द्र के लिए माथे पर सफ़ेद चिह्न और आगे निकले सींग वाले पशु का आलभन करे। युद्ध बल, मन्यु और मन से जीता जाता है, इसलिए इन्द्र उसमें ये तीनों रखता है और वह युद्ध जीतता है। गाँव (अनुयायी) चाहने वाला मरुतों से युक्त इन्द्र के लिए चितकबरी जाँघों वाले पशु का आलभन करे। तब इन्द्र उसे सजात देता है। बैल होने से पशु इन्द्र का है और चितकबरा होने से मरुतों का। पीछे की ओर चितकबरा होने से प्रजा उसके पीछे चलने वाली बनती है। अन्न चाहने वाला सोम के लिए भूरे पशु का आलभन करे, क्योंकि अन्न सोम का है और भूरा रंग अन्न का रूप है। तब वह अन्न खाने वाला बनता है। जो राज्य के योग्य हो पर जिसे राज्य न मिले, वह भी सोम के लिए भूरे पशु का आलभन करे, क्योंकि राज्य सोम का है और भूरा रंग सोम का रूप है। तब राज्य उसके आगे झुकता है। जिसकी श्री चली गई हो और जो स्थिरता चाहता हो, वह वृत्र को पार करने वाले इन्द्र के लिए सफ़ेद चिह्न और आगे निकले सींग वाले पशु का आलभन करे। तब वह पाप-रूपी वृत्र को पार करके स्थिरता पाता है। पाप से ग्रस्त व्यक्ति शत्रुता का नाश करने वाले इन्द्र के लिए ऐसे ही पशु का आलभन करे, क्योंकि पाप ही 'अभिमाति' है। तब इन्द्र उसका पाप दूर कर देता है। राज्य के योग्य जिस व्यक्ति को राज्य न मिले, वह वज्रधारी इन्द्र के लिए ऐसे ही पशु का आलभन करे। तब इन्द्र उसे वज्र देता है, वज्र उसे समृद्धि के लिए प्रज्वलित करता है और राज्य उसके आगे झुकता है। सफ़ेद चिह्न और आगे निकले सींग वज्र का रूप हैं।
(End of the previous section: for the Adityas, for a wish, one should offer goats with dewlaps.) The gods and the Asuras were competing for these worlds. Vishnu saw this dwarf animal, offered it to his own deity, and so won these worlds. Therefore a man in a contest should offer a dwarf animal to Vishnu. By becoming Vishnu, he wins these worlds. He should offer it on uneven ground, because these worlds are uneven, as it were. A man engaged in battle should offer an animal with a white blaze and forward-pointing horns to Indra, who has fury and spirit. Battle is won by strength, fury and spirit, so Indra puts these into him and he wins. A man who wants a following should offer an animal with spotted thighs to Indra with the Maruts. Indra then gives him kinsmen. As a bull it belongs to Indra, and as spotted it belongs to the Maruts. It is spotted behind, so the people come to follow behind him. A man who wants food should offer a brown animal to Soma, because food belongs to Soma and brown is the form of food. He then becomes an eater of food. A man fit to rule who does not gain the kingship should also offer a brown animal to Soma, because kingship belongs to Soma and brown is Soma's form. The kingship then bows to him. A man who has lost his fortune and wants a firm footing should offer a blazed animal with forward-pointing horns to Indra, the overcomer of Vritra. He crosses evil, which is Vritra, and reaches firm footing. A man gripped by evil should offer the same kind of animal to Indra, the slayer of hostility, because evil is hostility. Indra then drives it away from him. A man fit to rule who does not gain the kingship should offer the same kind of animal to Indra, who holds the vajra. Indra gives him the vajra, the vajra kindles him to prosperity, and the kingship bows to him. The blaze and the forward-pointing horns are the form of the vajra.