१ध्रु॒वोऽ॑सि ध्रु॒वोऽ॑हं स॑जा॒तेषु॑ भूयास॒मित्या॑ह ध्रु॒वाने॒वैना᳚न् कुरुत उ॒ग्रो᳚ऽस्यु॒ग्रोऽ॑हं स॑जा॒तेषु॑ भूयास॒मित्या॒हाप्र॑तिवादिन ए॒वैना᳚न्कुरुतेऽभि॒भूर॑स्यभि॒भूर॒हं स॑जा॒तेषु॑ भूयास॒मित्या॑ह॒ य ए॒वैनं॑ प्रत्यु॒त्पिपी॑ते॒ तमुपा᳚स्यते यु॒नज्मि॑ त्वा॒ ब्रह्म॑णा॒ दैव्ये॒नेत्या॑है॒ष वा अ॒ग्नेऱ्योग॒स्तेनै॒ ३४ वैनं॑ युनक्ति य॒ज्ञस्य॒ वै समृ॑द्धेन दे॒वाः सु॑व॒र्गं लो॒कमा॑यन्, य॒ज्ञस्य॒ व्यृ॑द्धे॒नासु॑रा॒न् परा॑भावय॒न्॒, यन्मे॑ अग्ने अ॒स्य य॒ज्ञस्य॒ रिष्या॒दित्या॑ह य॒ज्ञस्यै॒व तथ्समृ॑द्धेन॒ यज॑मानः सुव॒र्गं लो॒कमे॑ति य॒ज्ञस्य॒ व्यृ॑द्धेन॒ भ्रातृ॑व्या॒न् परा॑ भावयत्यग्नि हो॒त्रमे॒ताभि॒र्व्याहृ॑तीभि॒रुप॑ सादयेद्यज्ञमु॒खं वा अ॑ग्निहो॒त्रं ब्रह्मै॒ता व्याहृ॑तयो यज्ञमु॒ख ए॒व ब्रह्म॑ ३५ कुरुते संवथ्स॒रे प॒र्याग॑त ए॒ताभि॑रे॒वोप॑सादये॒द् ब्रह्म॑णै॒वोभ॒यतः॑ संवथ्स॒रं परि॑गृह्णाति दर्शपूर्णमा॒सौ चा॑तुर्मा॒स्यान्या॒लभ॑मान ए॒ताभि॒र्व्याहृ॑तीभिर् ह॒वीग्ष्यासा॑दयेद्यज्ञमु॒खं वै द॑र्शपूर्णमा॒सौ चा॑तुर्मा॒स्यानि॒ ब्रह्मै॒ता व्याहृ॑तयो यज्ञमु॒ख ए॒व ब्रह्म॑ कुरुते संवथ्स॒रे प॒र्याग॑त ए॒ताभि॑रे॒वासा॑दये॒द् ब्रह्म॑णै॒वोभ॒यतः॑ संवथ्स॒रं परि॑गृह्णाति॒ यद्वै य॒ज्ञस्य॒ साम्ना᳚ क्रि॒यते॑ रा॒ष्ट्रं ३६ य॒ज्ञस्याऽऽ॒शीर्ग॑च्छति॒ यदृ॒चा विशं॑ य॒ज्ञस्याऽऽ॒शीर्ग॑च्छ॒त्यथ॑ ब्राह्म॒णोऽ॑ना॒शीर्के॑ण य॒ज्ञेन॑ यजते सामिधे॒नीर॑नुव॒क्ष्यन्ने॒ता व्याहृ॑तीः पु॒रस्ता᳚द्दध्या॒द् ब्रह्मै॒व प्र॑ति॒पदं॑ कुरुते॒ तथा᳚ ब्राह्म॒णः साशी᳚र्केण य॒ज्ञेन॑ यजते॒ यं का॒मये॑त॒ यज॑मानं॒ भ्रातृ॑व्यमस्य य॒ज्ञस्याऽऽ॒शीर्ग॑च्छे॒दिति॒ तस्यै॒ता व्याहृ॑तीः पुरोऽनुवा॒क्या॑यां दध्याद् भ्रातृव्यदेव॒त्या॑ वै पु॑रोऽनुवा॒क्या᳚ भ्रातृ॑व्यमे॒वास्य॑ य॒ज्ञस्या॒ ३७ ऽशीर्ग॑च्छति॒ यान् का॒मये॑त॒ यज॑मानान्थ्स॒माव॑त्येनान्, य॒ज्ञस्याऽऽ॒शीर्ग॑च्छे॒दिति॒ तेषा॑मे॒ता व्याहृ॑तीः पुरोऽनुवा॒क्या॑या अर्ध॒र्च एकां᳚ दध्याद्या॒ज्या॑यै पु॒रस्ता॒देकां᳚ या॒ज्या॑या अर्ध॒र्च एकां॒ तथै॑नान्थ्स॒माव॑ती य॒ज्ञस्याऽऽ॒शीर्ग॑च्छति॒ यथा॒ वै प॒र्जन्यः॒ सुवृ॑ष्टं॒ वर्ष॑त्ये॒वं य॒ज्ञो यज॑मानाय वर्षति॒ स्थल॑योद॒कं प॑रिगृ॒ह्णन्त्या॒शिषा॑ य॒ज्ञं यज॑मानः॒ परि॑गृह्णाति॒ मनोऽ॑सि प्राजाप॒त्यं ३८ मन॑सा मा भू॒तेनाऽऽवि॒शेत्या॑ह॒ मनो॒ वै प्रा॑जाप॒त्यं प्रा॑जाप॒त्यो य॒ज्ञो मन॑ ए॒व य॒ज्ञमा॒त्मन् ध॑त्ते॒ वाग॑स्यै॒न्द्री स॑पत्न॒क्षय॑णी वा॒चा मे᳚न्द्रि॒येणाऽऽ वि॒शेत्या॑है॒न्द्री वै वाग्वाच॑मे॒वैन्द्रीमा॒त्मन् ध॑त्ते ॥ तेनै॒व ब्रह्म॑ रा॒ष्ट्रमे॒वास्य॑ य॒ज्ञस्य॑ प्राजाप॒त्यं षट्त्रिं॑शच्च
'तुम ध्रुव हो, मैं सजातों में ध्रुव होऊँ', 'तुम उग्र हो...', 'तुम अभिभू हो...' कहने से यजमान अपने सजातों को स्थिर, अपना विरोध न करने वाला बनाता है, और जो उसके विरुद्ध उठता है उसे गिरा देता है। 'दैव्य ब्रह्म से तुम्हें जोड़ता हूँ' अग्नि का जोतना है। देवों ने यज्ञ की समृद्धि से स्वर्ग पाया और उसकी विफलता से असुरों को हराया; 'हे अग्नि, इस यज्ञ का जो अंश मुझसे बिगड़े' कहकर यजमान भी वैसा ही करता है। अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास और चातुर्मास्य की हवियाँ इन व्याहृतियों से रखी जाएँ, और वर्ष पूरा होने पर फिर इन्हीं से; यज्ञ का मुख ब्रह्म बनता है और वर्ष दोनों ओर से ब्रह्म से घिर जाता है। साम से जो किया जाता है उसका आशीर्वाद राष्ट्र (राजशक्ति) को और ऋचा से जो किया जाता है उसका विश् (प्रजा) को जाता है, इसलिए ब्राह्मण बिना आशीर्वाद के यज्ञ करता है; सामिधेनी से पहले व्याहृतियाँ रखने से ब्रह्म ही आरम्भ बनता है और ब्राह्मण आशीर्वाद सहित यज्ञ करता है। जिसके शत्रु को फल दिलाना हो, उसके लिए व्याहृतियाँ पुरोनुवाक्या में रखे, क्योंकि पुरोनुवाक्या शत्रु की देवता वाली है; जिन यजमानों को बराबर फल देना हो, उनके लिए पुरोनुवाक्या के अर्धर्च में, याज्या से पहले, और याज्या के अर्धर्च में एक-एक रखे। जैसे पर्जन्य अच्छी वर्षा करता है वैसे यज्ञ यजमान पर बरसता है, और जैसे लोग मेड़ से जल को घेरते हैं वैसे यजमान आशीर्वाद से यज्ञ को घेरता है। 'तुम प्राजापत्य मन हो, मन और भूत के साथ मुझमें प्रवेश करो' से वह प्राजापत्य यज्ञ को अपने भीतर रखता है, और 'तुम ऐन्द्री, शत्रुनाशिनी वाक् हो, वाक् और इन्द्रिय के साथ मुझमें प्रवेश करो' से ऐन्द्री वाक् को अपने भीतर रखता है।
By saying 'You are firm; may I be firm among my kinsmen', 'You are strong…', 'You are overpowering…', the sacrificer makes his kinsmen firm and unresisting, and throws down whoever rises against him; 'I yoke you with divine brahman' is the yoking of Agni. The gods reached the world of heaven through the sacrifice's success and defeated the Asuras through its failure; by saying 'Agni, whatever of this sacrifice of mine goes wrong', the sacrificer does the same against his rivals. The agnihotra, and the offerings of the new- and full-moon and four-monthly rites, should be set down with these vyahritis, and again when the year comes round: the vyahritis are brahman, so he puts brahman at the sacrifice's mouth and encloses the year with brahman on both sides. The blessing of what is done with the saman goes to the royal power, and of what is done with the rik to the people, so a Brahmin sacrifices without a blessing; by placing the vyahritis before the samidheni verses he makes brahman the opening, and the Brahmin then sacrifices with a blessing. If the sacrificer's rival is to get the blessing, place them in the invitatory verse, which belongs to the rival; if several sacrificers are to share it equally, place one in the half-verse of the invitatory, one before the offering verse, and one in its half-verse. As Parjanya rains well, the sacrifice rains on the sacrificer, and as people enclose water with an embankment, he encloses the sacrifice with the blessing. With 'You are mind, belonging to Prajapati; enter me with mind and being' he places the sacrifice, which belongs to Prajapati, in himself, and with 'You are Indra's speech, destroyer of rivals; enter me with speech and Indra's power' he places Indra's speech in himself.