१वि॒त्ताय॑नी मेऽसि ति॒क्ताय॑नी मेऽ॒स्यव॑तान्मा नाथि॒तमव॑तान्मा व्यथि॒तं वि॒देर॒ग्निर्नभो॒ नामाग्ने॑ अङ्गिरो॒ यो᳚ऽस्यां पृ॑थि॒व्यामस्यायु॑षा॒ नाम्नेहि॒ यत्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॒ त्वाऽऽद॒धेऽग्ने॑ अङ्गिरो॒ यो द्वि॒तीय॑स्यां तृ॒तीय॑स्यां पृथि॒व्यामस्यायु॑षा॒ नाम्नेहि॒ यत्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ २३ य॒ज्ञियं॒ तेन॒ त्वाऽऽद॑धे सिं॒॒हीर॑सि महि॒षीर॑स्यु॒रु प्र॑थस्वो॒रु ते॑ य॒ज्ञप॑तिः प्रथतां ध्रु॒वाऽसि॑ दे॒वेभ्यः॑ शुन्धस्व दे॒वेभ्यः॑ शुम्भस्वेन्द्र घो॒षस्त्वा॒ वसु॑भिः पु॒रस्ता᳚त्पातु॒ मनो॑जवास्त्वा पि॒तृभि॑र्दक्षिण॒तः पा॑तु॒ प्रचे॑तास्त्वा रु॒द्रैः प॒श्वात्पा॑तु वि॒श्वक॑र्मा त्वाऽऽदि॒त्यैरु॑त्तर॒तः पा॑तु सिं॒॒हीर॑सि सपत्नसा॒ही स्वाहा॑ सिं॒॒हीर॑सि सुप्रजा॒वनिः॒ स्वाहा॑ सिं॒॒ही २४ र॑सि राय॒स्पोष॒वनिः॒ स्वाहा॑ सिं॒॒हीर॑स्यादित्य॒वनिः॒ स्वाहा॑ सिं॒॒हीर॒स्या व॑ह दे॒वान्दे॑वय॒ते यज॑मानाय॒ स्वाहा॑ भू॒तेभ्य॑स्त्वा वि॒श्वायु॑रसि पृथि॒वीं दृं॑ह ध्रुव॒क्षिद॑स्य॒न्तरि॑क्षं दृंहाच्युत॒क्षिद॑सि॒ दिवं॑ दृंहा॒ग्नेर्भस्मा᳚स्य॒ग्नेः पुरी॑षमसि ॥ नाम॑ सुप्रजा॒वनिः॒ स्वाहा॑ सिं॒॒हीः पञ्च॑त्रिंशच्च
तू मेरी प्राप्ति का आश्रय है, तू मेरी पीड़ा का आश्रय है; ज़रूरत में और व्यथा में मेरी रक्षा कर। नभस् नाम वाली (भूमि) को अग्नि ने पाया। हे अग्नि अङ्गिरस्, जो तुम इस पहली, दूसरी और तीसरी पृथ्वी में हो, आयु और नाम के साथ आओ; तुम्हारा जो अपराजित, यज्ञ-योग्य नाम है, उससे मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। (अब उत्तरवेदी से:) तू सिंहनी है, तू महिषी है; खूब फैल, तेरा यजमान भी खूब फैले; तू स्थिर है; देवों के लिए शुद्ध हो, देवों के लिए सज। इन्द्रघोष वसुओं के साथ पूर्व से, मनोजवस् पितरों के साथ दक्षिण से, प्रचेतस् रुद्रों के साथ पश्चिम से, विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर से तेरी रक्षा करें। तू सिंहनी है — शत्रुओं को हराने वाली, उत्तम सन्तान देने वाली, धन की वृद्धि देने वाली, आदित्यों को प्राप्त कराने वाली, स्वाहा; तू सिंहनी है, देवों की उपासना करने वाले यजमान के लिए देवों को ले आ, स्वाहा। (आहुति की करछी से:) भूतों के लिए तुझे (उठाता हूँ)। (परिधियों से:) तू विश्वायु है, पृथ्वी को दृढ़ कर; तू ध्रुवक्षित् है, अन्तरिक्ष को दृढ़ कर; तू अच्युतक्षित् है, द्युलोक को दृढ़ कर। (बिखेरी जाती बालू से:) तू अग्नि की भस्म है, तू अग्नि का पुरीष है।
You are my refuge in gain, you are my refuge in hardship; protect me when I am in need, protect me when I am troubled. Agni has found the one named Nabhas. Agni Angiras, you who are in this earth, and in the second and third earth, come with life and name; with your unassailable name fit for worship I set you down. (To the altar:) You are a lioness, you are a queen; spread wide, and may your sacrificer spread wide; you are firm; be cleansed for the gods, be adorned for the gods. May Indraghosha with the Vasus guard you from the east, Manojavas with the Fathers from the south, Prachetas with the Rudras from the west, Vishvakarman with the Adityas from the north. You are a lioness who overcomes rivals, who wins good offspring, who wins growth of wealth, who wins the Adityas — svaha; you are a lioness: bring the gods to the sacrificer who seeks them — svaha. (To the offering ladle:) For beings I raise you. (To the enclosing sticks:) You are life-giving to all: make the earth firm; you dwell firmly: make the air firm; you dwell unshaken: make the sky firm. (To the sand being scattered:) You are the ash of Agni, you are the loose earth of Agni.