यजुर्वेदYajurvedaTS 7.3.10

एकविंशतिरात्र सत्र की व्याख्याThe twenty-one-night sattra explained

नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.

  1. १

    अ॒सावा॑दि॒त्यो᳚ऽस्मि३ंल्लो॒क आ॑सी॒त्तं दे॒वाः पृ॒ष्ठैः प॑रि॒गृह्य॑ सुव॒र्गं लो॒कम॑गमय॒न्परै॑र॒वस्ता॒त्पर्य॑गृह्णन्दिवाकी॒र्त्ये॑न सुव॒र्गे लो॒के प्रत्य॑स्थापय॒न्परै᳚ः प॒रस्ता॒त्पर्य॑गृह्णन्पृ॒ष्ठैरु॒पावा॑रोह॒न्थ्स वा अ॒सावा॑दि॒त्योऽ॑मुष्मि॑३ंल्लो॒के परै॑रुभ॒यतः॒ परि॑गृहीतो॒ यत्पृ॒ष्ठानि॒ भव॑न्ति सुव॒र्गमे॒व तैर्लो॒कं यज॑माना यन्ति॒ परै॑र॒वस्ता॒त्परि॑ गृह्णन्ति दिवाकी॒र्त्ये॑न २६ सुव॒र्गे लो॒के प्रति॑ तिष्ठन्ति॒ परै᳚ः प॒रस्ता॒त्परि॑ गृह्णन्ति पृ॒ष्ठैरु॒पाव॑रोहन्ति॒ यत्परे॑ प॒रस्ता॒न्न स्युः परा᳚ञ्चः सुव॒र्गाल्लो॒कान्निष्प॑द्येर॒न्॒ यद॒वस्ता॒न्न स्युः प्र॒जा निर्द॑हेयुर॒भितो॑ दिवाकी॒र्त्यं॑ परः॑ सामानो भवन्ति सुव॒र्ग ए॒वैना᳚३ंल्लो॒क उ॑भ॒यतः॒ परि॑ गृह्णन्ति॒ यज॑माना॒ वै दि॑वाकी॒र्त्यं॑ संवथ्स॒रः परः॑ सामानोऽ॒भितो॑ दिवाकी॒र्त्यं॑ परः॑ सामानो भवन्ति संवथ्स॒र ए॒वोभ॒यतः॒ २७ प्रति॑ तिष्ठन्ति पृ॒ष्ठं वै दि॑वाकी॒र्त्यं॑ पा॒र्श्वे परः॑ सामानोऽ॒भितो॑ दिवाकी॒र्त्यं॑ परः॑ सामानो भवन्ति॒ तस्मा॑द॒भितः॑ पृ॒ष्ठं पा॒र्श्वे भूयि॑ष्ठा॒ ग्रहा॑ गृह्यन्ते॒ भूयि॑ष्ठं शस्यते य॒ज्ञस्यै॒व तन्म॑ध्य॒तो ग्र॒न्थिं ग्र॑थ्न॒न्त्यवि॑स्रंसाय स॒प्त गृ॑ह्यन्ते स॒प्त वै शी॑र्ष॒ण्या᳚ः प्रा॒णाः प्रा॒णाने॒व यज॑मानेषु दधति॒ यत्प॑रा॒चीना॑नि पृ॒ष्ठानि॒ भव॑न्त्य॒मुमे॒व तैर्लो॒कम॒भ्यारो॑हन्ति॒ यदि॒मं लो॒कं न २८ प्र॑त्यव॒रोहे॑यु॒रुद्वा॒ माद्ये॑यु॒र्यज॑मानाः॒ प्र वा॑ मीयेर॒न्॒ यत्प्र॑ती॒चीना॑नि पृ॒ष्ठानि॒ भव॑न्ती॒ममे॒व तैर्लो॒कं प्र॒त्यव॑रोह॒न्त्यथो॑ अ॒स्मिन्ने॒व लो॒के प्रति॑ तिष्ठ॒न्त्यनु॑न्मादा॒येन्द्रो॒ वा अप्र॑तिष्ठित आसी॒थ्स प्र॒जाप॑ति॒मुपा॑धाव॒त्तस्मा॑ ए॒तमे॑कविंशतिरा॒त्रं प्राय॑च्छ॒त्तमाह॑र॒त्तेना॑यजत॒ ततो॒ वै स प्रत्य॑तिष्ठ॒द्ये ब॑हुया॒जिनोऽप्र॑तिष्ठिताः॒ २९ स्युस्त ए॑कविंशतिरा॒त्रमा॑सीर॒न्द्वाद॑श॒ मासाः॒ पञ्च॒र्तव॒स्त्रय॑ इ॒मे लो॒का अ॒सावा॑दि॒त्य ए॑कविं॒॒श ए॒ताव॑न्तो॒ वै दे॑वलो॒कास्तेष्वे॒व य॑थापू॒र्वं प्रति॑ तिष्ठन्त्य॒सावा॑दि॒त्यो न व्य॑रोचत॒ स प्र॒जाप॑ति॒मुपा॑धाव॒त्तस्मा॑ ए॒तमे॑कविंशतिरा॒त्रं प्राय॑च्छ॒त्तमाह॑र॒त्तेना॑यजत॒ ततो॒ वै सोऽ॑रोचत॒ य ए॒वं वि॒द्वांस॑ एकविंशतिरा॒त्रमास॑ते॒ रोच॑न्त ए॒वैक॑विंशतिरा॒त्रो भ॑वति॒ रुग्वा ए॑कविं॒॒शो रुच॑मे॒व ग॑च्छ॒न्त्यथो᳚ प्रति॒ष्ठामे॒व प्र॑ति॒ष्ठा ह्ये॑कविं॒॒शोऽ॑तिरा॒त्राव॒भितो॑ भवतो ब्रह्मवर्च॒सस्य॒ परि॑गृहीत्यै ॥ ७। ३। १०॥ गृ॒ह्ण॒न्ति॒ दि॒वा॒की॒र्त्ये॑नै॒वोभ॒यतो॒ नाप्र॑तिष्ठिता॒ आस॑त॒ एक॑विंशतिश्च

    यह व्याख्या है कि एकविंशतिरात्र सत्र में दिनों का क्रम ऐसा क्यों है। आदित्य पहले इसी लोक में था। देवों ने पृष्ठ दिनों से उसे घेरकर स्वर्ग लोक पहुँचाया, परःसाम दिनों से नीचे की ओर घेरा, दिवाकीर्त्य दिन से स्वर्ग में स्थापित किया, फिर परःसाम दिनों से ऊपर की ओर घेरा और पृष्ठ दिनों से नीचे उतर आए। इसी तरह यजमान स्वर्ग जाते हैं, वहाँ टिकते हैं और लौट आते हैं। यदि परःसाम दिन ऊपर न हों तो वे स्वर्ग से गिर पड़ें। यदि नीचे न हों तो (सूर्य) प्रजा को जला दे। यजमान दिवाकीर्त्य दिन हैं और परःसाम दिन संवत्सर हैं। दिवाकीर्त्य पीठ है और परःसाम उसकी दोनों बगलें, इसलिए पीठ के दोनों ओर बगलें होती हैं। उस बीच के दिन सबसे अधिक ग्रह (सोम-पात्र) भरे जाते हैं और सबसे अधिक पाठ होता है। इस तरह यज्ञ के बीच में गाँठ बाँधी जाती है ताकि वह ढीला न पड़े। सात ग्रह भरे जाते हैं, क्योंकि सिर में सात प्राण हैं। सीधे क्रम वाले पृष्ठ दिनों से यजमान उस लोक पर चढ़ते हैं। उलटे क्रम वाले पृष्ठ दिनों से वे इस लोक में लौटते हैं, ताकि पागल न हों या मर न जाएँ। इन्द्र प्रतिष्ठित नहीं था, और आदित्य चमकता नहीं था। दोनों प्रजापति के पास गए, प्रजापति ने उन्हें यह एकविंशतिरात्र दिया, और उससे यज्ञ करके इन्द्र प्रतिष्ठित हुआ तथा आदित्य चमकने लगा। जो बहुत यज्ञ करके भी प्रतिष्ठित नहीं हैं, वे यह सत्र करें। बारह मास, पाँच ऋतुएँ, तीन लोक और इक्कीसवाँ आदित्य, इतने ही देवलोक हैं, और उन्हीं में वे क्रम से प्रतिष्ठित होते हैं। इक्कीस दीप्ति (रुच्) है और प्रतिष्ठा भी। दोनों छोरों पर अतिरात्र दिन ब्रह्मवर्चस को घेरकर सुरक्षित रखने के लिए होते हैं।

    This explains why the days of the twenty-one-night rite (ekaviṃśatirātra) run in the order they do. The Aditya was once in this world. The gods enclosed him with the pṛṣṭha days and brought him to the heavenly world. They enclosed him below with the paraḥsāman days, set him firmly in the heavenly world with the divākīrtya day, enclosed him above with the paraḥsāman days, and came back down with the pṛṣṭha days. In the same way the sacrificers go to heaven, stand firm there and return. If the paraḥsāman days were not above, they would fall from heaven. If they were not below, (the sun) would burn up living creatures. The sacrificers are the divākīrtya day and the year is the paraḥsāman days. The divākīrtya is the back and the paraḥsāmans are its flanks, which is why the flanks lie on either side of the back. On that middle day the most soma cups (grahas) are drawn and the most is recited. This ties a knot in the middle of the sacrifice so that it does not come loose. Seven cups are drawn, because there are seven breaths in the head. Through the pṛṣṭha days in forward order the sacrificers climb to that world. Through the pṛṣṭha days in reverse order they come back down to this one, so that they do not go mad or die. Indra had no firm footing, and the Aditya did not shine. Each went to Prajapati, who gave him this twenty-one-night rite. Indra performed it and stood firm, and the Aditya performed it and shone. People who sacrifice often but still lack a footing should hold it. Twelve months, five seasons, the three worlds and the Aditya as twenty-first: that is how many worlds of the gods there are, and in them the participants stand firm in due order. Twenty-one is brilliance and also a firm foundation. The atirātra days at either end are there to enclose and keep the brilliance of the brahman (brahmavarcasa).