यजुर्वेदYajurvedaTS 3.2.9
अध्वर्यु के प्रतिगर की व्याख्याThe Adhvaryu's response-call explained
नीचे के भावार्थ AI से बने हैं और समीक्षा बाकी है।The meanings below are AI-generated and await review.
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यद्वै होता᳚ध्व॒र्युम॑भ्या॒ह्वय॑ते॒ वज्र॑मेनम॒भि प्र व॑र्तय॒त्युक्थ॑शा॒ इत्या॑ह प्रातःसव॒नं प्र॑ति॒गीर्य॒ त्रीण्ये॒तान्य॒क्षरा॑णि त्रि॒पदा॑ गाय॒त्री गा॑य॒त्रं प्रा॑तःसव॒नं गा॑यत्रि॒यैव प्रा॑तःसव॒ने वज्र॑म॒न्तर्ध॑त्त उ॒क्थं वा॒चीत्या॑ह॒ माध्य॑न्दिनं॒॒ सव॑नं प्रति॒गीर्य॑ च॒त्वार्ये॒तान्य॒क्षरा॑णि॒ चतु॑ष्पदा त्रि॒ष्टुप्त्रैष्टु॑भं॒ माध्य॑न्दिनं॒॒ सव॑नं त्रि॒ष्टुभै॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने॒ वज्र॑म॒न्तर्ध॑त्त ३६ उ॒क्थं वा॒चीन्द्रा॒येत्या॑ह तृतीयसव॒नं प्र॑ति॒गीर्य॑ स॒प्तैतान्य॒क्षरा॑णि स॒प्तप॑दा॒ शक्व॑री शाक्व॒रो वज्रो॒ वज्रे॑णै॒व तृ॑तीयसव॒ने वज्र॑म॒न्तर्ध॑त्ते ब्रह्मवा॒दिनो॑ वदन्ति॒ स त्वा अ॑ध्व॒र्युः स्या॒द्यो य॑थासव॒नं प्र॑तिग॒रे छन्दां॑सि संपा॒दये॒त्तेजः॑ प्रातःसव॒न आ॒त्मन् दधी॑तेंद्रि॒यं माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने प॒शूग्स्तृ॑तीयसव॒न इत्युक्थ॑शा॒ इत्या॑ह प्रातःसव॒नं प्र॑ति॒गीर्य॒ त्रीण्ये॒तान्य॒क्षरा॑णि ३७ त्रि॒पदा॑ गाय॒त्री गा॑य॒त्रं प्रा॑तःसव॒नं प्रा॑तःसव॒न ए॒व प्र॑तिग॒रे छन्दां॑सि॒ सं पा॑दय॒त्यथो॒ तेजो॒ वै गा॑य॒त्री तेजः॑ प्रातःसव॒नं तेज॑ ए॒व प्रा॑तःसव॒न आ॒त्मन्ध॑त्त उ॒क्थं वा॒चीत्या॑ह॒ माध्य॑न्दिनं॒॒ सव॑नं प्रति॒गीर्य॑ च॒त्वार्ये॒तान्य॒क्षरा॑णि॒ चतु॑ष्पदा त्रि॒ष्टुप्त्रैष्टु॑भं॒ माध्य॑न्दिनं॒॒ सव॑नं॒ माध्य॑न्दिन ए॒व सव॑ने प्रतिग॒रे छन्दां॑सि॒ सं पा॑दय॒त्यथो॑ इंद्रि॒यं वै त्रि॒ष्टुगिं॑द्रि॒यं माध्य॑न्दिनं॒॒ सव॑न ३८ मिन्द्रि॒यमे॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑न आ॒त्मन्ध॑त्त उ॒क्थं वा॒चीन्द्रा॒येत्या॑ह तृतीयसव॒नं प्र॑ति॒गीर्य॑ स॒प्तैतान्य॒क्षरा॑णि स॒प्तप॑दा॒ शक्व॑री शाक्व॒राः प॒शवो॒ जाग॑तं तृतीयसव॒नं तृ॑तीयसव॒न ए॒व प्र॑तिग॒रे छन्दां॑सि॒ सं पा॑दय॒त्यथो॑ प॒शवो॒ वै जग॑ती प॒शव॑स्तृतीयसव॒नं प॒शूने॒व तृ॑तीयसव॒न आ॒त्मन्ध॑त्ते॒ यद्वै होता᳚ध्व॒र्युम॑भ्या॒ह्वय॑त आ॒व्य॑मस्मिन्दधाति॒ तद्यन्ना ३९ ऽप॒हनी॑त पु॒रास्य॑ संवथ्स॒राद्गृ॒ह आ वे॑वीर॒ञ्छोंसा॒ मोद॑ इ॒वेति॑ प्र॒त्याह्व॑यते॒ तेनै॒व तदप॑ हते॒ यथा॒ वा आय॑तां प्र॒तीक्ष॑त ए॒वम॑ध्व॒र्युः प्र॑तिग॒रं प्रती᳚क्षते॒ यद॑भिप्रतिगृणी॒याद्यथाय॑तया समृ॒च्छते॑ ता॒दृगे॒व तद्यद॑र्ध॒र्चाल्लुप्ये॑त॒ यथा॒ धाव॑द्भ्यो॒ हीय॑ते ता॒दृगे॒व तत्प्र॒बाहु॒ग्वा ऋ॒त्विजा॑मुद्गी॒था उ॑द्गी॒थ ए॒वोद्गा॑तृ॒णा ४० मृ॒चः प्र॑ण॒व उ॑क्थशं॒॒सिनां᳚ प्रतिग॒रो᳚ऽध्वर्यू॒णां य ए॒वं वि॒द्वान्प्र॑तिगृ॒णात्य॑न्ना॒द ए॒व भ॑व॒त्यास्य॑ प्र॒जायां᳚ वा॒जी जा॑यत इ॒यं वै होता॒साव॑ध्व॒र्युर्यदासी॑नः॒ शंस॑त्य॒स्या ए॒व तद्धोता॒ नैत्यास्त॑ इव॒ हीयमथो॑ इ॒मामे॒व तेन॒ यज॑मानो दुहे॒ यत्तिष्ठ॑न् प्रतिगृ॒णात्य॒मुष्या॑ ए॒व तद॑ध्व॒र्युर्नैति॒ ४१ तिष्ठ॑तीव॒ ह्य॑सावथो॑ अ॒मूमे॒व तेन॒ यज॑मानो दुहे॒ यदासी॑नः॒ शंस॑ति॒ तस्मा॑दि॒तः प्र॑दानं दे॒वा उप॑ जीवन्ति॒ यत्तिष्ठ॑न्प्रतिगृ॒णाति॒ तस्मा॑द॒मुतः॑ प्रदानं मनु॒ष्या॑ उप॑ जीवन्ति॒ यत्प्राङासी॑नः॒ शंस॑ति प्र॒त्यङ्तिष्ठ॑न्प्रतिगृ॒णाति॒ तस्मा᳚त्प्रा॒चीनं॒॒ रेतो॑ धीयते प्र॒तीची᳚ः प्र॒जा जा॑यन्ते॒ यद्वै होता᳚ध्व॒र्युम॑भ्या॒ह्वय॑ते॒ वज्र॑मेनम॒भि प्र व॑र्तयति॒ परा॒ङा व॑र्तते॒ वज्र॑मे॒व तन्नि क॑रोति सव॑ने॒
जब होता अध्वर्यु को पुकारता है, तो वह उसकी ओर वज्र घुमाता है। इसलिए अध्वर्यु प्रातःसवन में तीन अक्षरों का 'उक्थशाः' (गायत्री के तीन पाद), माध्यन्दिन सवन में चार अक्षरों का 'उक्थं वाचि' (त्रिष्टुभ् के चार पाद) और तृतीय सवन में सात अक्षरों का 'उक्थं वाचीन्द्राय' (शक्वरी के सात पाद) उत्तर में कहता है। इस तरह वह उस छन्द से उस वज्र को रोक देता है और अपने भीतर क्रम से तेज, इन्द्रिय-बल और पशु धारण करता है। ब्रह्मवादी कहते हैं कि सच्चा अध्वर्यु वही है जो हर सवन के प्रतिगर में उसी सवन का छन्द पूरा करे। होता की पुकार अध्वर्यु पर एक संकट (आव्य) डाल देती है; अगर वह उसे दूर न करे तो वर्ष पूरा होने से पहले उसके घर में विलाप होगा। 'शोंसा मोद इव' कहकर उत्तर देने से वह संकट दूर होता है। अध्वर्यु को प्रतिगर के समय की प्रतीक्षा वैसे ही करनी चाहिए जैसे कोई आते हुए व्यक्ति की करता है। होता के साथ-साथ बोलना सामने आते व्यक्ति से टकराने जैसा है, और अर्धर्चा पर चूक जाना दौड़ते लोगों से पीछे छूट जाने जैसा। उद्गाताओं का अपना अंश उद्गीथ है, ऋचाएँ पढ़ने वालों (उक्थशंसी) का प्रणव और अध्वर्युओं का प्रतिगर। जो यह जानकर प्रतिगर करता है वह अन्न खाने वाला होता है और उसकी सन्तान में बलवान पुत्र जन्म लेता है। होता यह पृथ्वी है और अध्वर्यु वह (द्युलोक)। होता बैठकर पाठ करता है क्योंकि पृथ्वी मानो बैठी है, और अध्वर्यु खड़ा होकर उत्तर देता है क्योंकि द्युलोक मानो खड़ा है; इनसे यजमान दोनों लोकों को दुहता है। इसी कारण देवता यहाँ (पृथ्वी) से दिए गए दान पर जीते हैं और मनुष्य वहाँ (द्युलोक) से दिए गए दान पर। होता पूर्व की ओर मुँह करके बैठता है और अध्वर्यु पश्चिम की ओर मुँह करके खड़ा होता है, इसलिए वीर्य आगे की ओर (पूर्वमुख) रखा जाता है और सन्तान पीछे की ओर (पश्चिममुख) जन्म लेती है। पुकारे जाने पर अध्वर्यु मुड़कर पीछे घूम जाता है और इस तरह उस वज्र को निष्फल कर देता है।
When the hotar calls on the adhvaryu, he rolls a vajra at him. So at the morning pressing the adhvaryu answers with 'ukthaśāḥ', three syllables, matching the three-footed gayatri. At the midday pressing he answers 'ukthaṃ vāci', four syllables, matching the four-footed trishtubh. At the third pressing he answers 'ukthaṃ vācīndrāya', seven syllables, matching the seven-footed shakvari. With each metre he blocks the vajra, and he takes into himself brilliance, vigour and cattle in that order. The theologians say the true adhvaryu is the one who completes the right metre for each pressing in his response. The hotar's call also puts an affliction (āvya) on him. If he did not remove it, people would be wailing in his house before the year was out. He removes it by answering 'śoṃsā moda iva'. He should wait for his moment to respond the way one waits for someone who is coming. Responding on top of the hotar is like colliding with that person, and dropping out at the half-verse is like falling behind runners. Each kind of priest has his own part: the udgītha belongs to the udgatars, the praṇava to the reciters, and the response-call to the adhvaryus. Whoever knows this and responds becomes an eater of food, and a vigorous son is born in his line. The hotar is this earth and the adhvaryu is yonder sky. The hotar recites seated because the earth sits, as it were, and the adhvaryu responds standing because the sky stands, as it were; through them the sacrificer milks both worlds. That is why the gods live on what is given from here and men on what is given from there. The hotar sits facing east and the adhvaryu stands facing west, so seed is placed facing forward and offspring are born facing back. When called, the adhvaryu turns away, and so he renders the vajra harmless.
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वज्र॑मं॒तर्ध॑त्ते॒ त्रीण्यै॒तान्य॒क्षरा॑णींद्रि॒यं माध्यं॑दिनं॒॒ सव॑नं॒ नोद्गा॑तृ॒णाम॑ध्व॒र्युर्नैति॑ वर्तयत्य॒ष्टौ च॑
यह कोई पाठ नहीं है, बल्कि अनुवाक की सूची है: पिछले खण्ड के हर पचास-पद वाले हिस्से के अन्तिम शब्द ('सवने वज्रमन्तर्धत्ते', 'त्रीण्येतान्यक्षराणि', 'इन्द्रियं माध्यन्दिनं सवनम्', 'नोद्गातृणाम्', 'अध्वर्युर्नैति', 'वर्तयति'), और फिर 'अष्टौ च' अर्थात् अन्त में आठ शब्द और।
This is not a text for recitation but the index of the anuvaka. It lists the closing words of each fifty-word section of the passage above ('savane vajram antardhatte', 'trīṇy etāny akṣarāṇi', 'indriyaṃ mādhyandinaṃ savanam', 'nodgātṛṇām', 'adhvaryur naiti', 'vartayati'), followed by 'aṣṭau ca', meaning 'and eight', the eight remaining words.